कश्मीर के खलनायक का नाम - धरा 370
विधन सभा में जब कश्मीर के लिए धरा 370 पर बहस चल रही थी, उस समय इसका नाम धरा 370 नहीं था। इसका नाम था - धरा 306-ए। संविधन जब अंतिम रूप से स्वीकार कर लिया गया तो इसका नाम पड़ा - धरा 370 और तबसे इसे इसी नाम से जाना और पुकारा जाता है। श्रीअमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी जाने वाली जमीन को लेकर कश्मीर घाटी में जिस तरह का भारत-विरोध्ी अलगाववादी आंदोलन चला, जिस तरह भारत का तिरंगा जलाकर राख कर दिया गया, जिस तरह खुलेआम पाकिस्तानी झंडे लहराए गए, और जिस तरह हुर्रियत नेता गिलानी ने इस्लामी भाइचारे की दुहाई देते हुए कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने की खुलेआम वकालत की, इस तमाम संदर्भ में देश की राजनीति में धरा 370 बहस के केंद्र में उभरकर आ गई है। यह शिद्दत से अनुभव किया जाने लगा है कि कश्मीर में जिस तरह का अलगाव खुलेआम पनपा और पनपने दिया गया उसकी जड़ में धरा 370 ही है जिसके कारण वहां भारत के विरोध् में कुछ भी बोलने की मानो आजादी सी मिली हुई है। दूसरी ओर यह भी अनुभव किया जा रहा है कि इन अलगाववादी स्वरों को नियंत्राण में लाने में जो सबसे बड़ी अड़चन सामने आ रही है, उसका नाम भी धारा 370 ही है। यानी कश्मीर में अलगाववाद को पैदा करने का कारण यदि धारा 370 है, तो उस अलगाववाद को खत्म न कर पाने में देश की मजबूरी का कारण भी धरा 370 ही है। आजादी के बाद जब देश का संविधन बनाने के लिए संविधन सभा डाॅ. आम्बेडकर द्वारा बनाए गए प्रारूप पर क्रमशः विचार कर रही थी और जब उस विचारक्रम में धारा 370 ;यानी धरा 306एद्ध पर विचार-विमर्श शुरू हुआ तो इस धरा को संविधन सभा में रखते हुए गोपाल स्वामी आयंगर ने स्पष्ट आश्वासन दिया था कि यह धरा बहुत जल्दी हट जाएगी। संविधन स्वीकार होने के कुछ वर्षों बाद खुद भारत के प्रधनमंत्राी नेहरू ने लोकसभा में अपने एक भाषण में कहा था कि धरा 370 बहुत कुछ घिस चुकी है और जो शेष रह गई है वह भी ध्ीरे-ध्ीरे घिस जाएगी। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्राी गुलाम मोहम्मद सादिक ने ;जो उस समय जम्मू-कश्मीर के प्रधनमंत्राी कहे जाते थेद्ध 1963 में, यानी आजादी मिलने के डेढ़ दशक बाद अपने एक भाषण में कहा था कि कश्मीर राज्य में कानून और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए धरा 370 का तुरंत हट जाना बहुत जरूरी है। प्रधनमंत्राी बनने के बाद उन्होंने कांग्रेस संसदीय दल की एक बैठक में कहा था कि यह धरा राज्य की प्रगति में बाध्क सि( हो रही है और इसलिए इसको संविधन से अविलंब हटा दिया जाना चाहिए। यह बात दीगर है कि जम्मू-कश्मीर का प्रधनमंत्राी बनने के कुछ वर्षों बाद वे अपनी ही कही हुई बात से पलट गए। संविधन सभा में जब धरा 370 पर बहस चल रही थी तो संविधन सभा के ही एक सदस्य हसरत मोहानी ने गोपालस्वामी आयंगर से यह पूछा कि जब जम्मू-कश्मीर राज्य का विलय दूसरे देशी राज्यों की तरह भारत संघ में हुआ है और जम्मू-कश्मीर समेत सभी राज्यों ने एक जैसे विलयपत्रा पर हस्ताक्षर किए हैं तो सिपर्फ जम्मू-कश्मीर के लिए ही धरा 370 के रूप में विशेष प्रावधन क्यों किया जा रहा है? इस सवाल के जवाब में गोपालस्वामी आयंगर ने कई कारण गिनाए थे जिनमें प्रमुख कारण यह कहा गया कि जम्मू-कश्मीर पर एक सशस्त्रा आक्रमण हुआ है जो अभी तक जारी है और स्थिति असामान्य बनी हुई है। राज्य के भीतर एक यु( चल रहा है। इसलिए असामान्य स्थिति में राज्य का प्रशासनतंत्रा भी असामान्य रूप से ही चलाया जाना चाहिए। धरा 370 इसी पृष्ठभूमि में रखी जा रही हैं। इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए प्रधनमंत्राी नेहरू ने भी कहा था कि जम्मू-कश्मीर के लोग भारत के अन्य राज्यों की तरह खुद को भारत का सहज नागरिक मानें इसके लिए उन्हें कुछ समय और उचित वातावरण दिया जाना चाहिए और धरा 370 का प्रावधन उसी संदर्भ में किया जा रहा है। यानी जम्मू-कश्मीर के लोगों को एक असामान्य स्थिति से निकलकर सामान्य स्थिति में आने की सुविध प्रदान करने के लिए ही धरा 370 नामक प्रावधन का निर्माण किया गया था। लेकिन उसके कारण घाटी के लोग, जो आज शत-प्रतिशत मुस्लिम है,ं क्योंकि करीब साढ़े चार-पांच लाख हिन्दू पंडित वहां से निकलने को मजबूर कर दिए गए, भारत के सहज और सामान्य नागरिक तो आज तक बन नहीं पाए बल्कि वे अलगाववादी राजनीति का शिकार होकर भारत विरोध्ी हो चुके हैं और ध्र्म के आधार पर उन्हें पाकिस्तान का हिस्सा बनने के लिए लगातार उकसाया जा रहा है। इसमें अचरज की बात यह है कि कश्मीर की जनता को अलगाववाद का प्रशिक्षण देने वाले, उन्हें पाकिस्तान परस्ती सिखाने वाले भारत विरोध्ी नेताओं को न केवल हर केंद्रीय सरकार द्वारा शह मिलती रही है बल्कि उन्हें बार-बार बातचीत के लिए बुलाकर परोक्ष रूप से राजनीतिक मान्यता भी प्रदान कर दी गई है। इस संपूर्ण पृष्ठभूमि में यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि धरा 370 कश्मीर घाटी को भारत से जोड़ने के बजाए भारत से अलग होने देने का एक मंच बन गई है और उस मंच का उपयोग करने वाले तमाम भारतद्रोही नेताओं को इसी धरा के कारण राजनीतिक मान्यता भी प्रदान कर दी गई है। यह इसी धरा का कमाल है कि कश्मीर में स्थित अमरनाथ मंदिर की यात्रा करने वाले भारतीयों की सुविध के लिए श्रीअमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी जाने वाली जमीन को वापस लेने का पफैसला इन्हीं अलगाववादी और भारतद्रोही नेताओं के दबाव में आकर ले लिया जाता है और भारत सरकार का एक नुमाइंदा यानी जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल एनएन वोहरा इस पफैसले पर अपनी मुहर लगाने से भी कोई परहेज अनुभव नहीं करते। इसलिए हर राजनीतिक पार्टी, कुछ खुलेआम तो कुछ आॅपफ द रिकार्ड ब्रीपिफंग में धरा 370 की उपयोगिता पर सवाल खड़े करने लगे हैं। इस परिप्रेक्ष्य में यह जानना दिलचस्प होगा कि इसी धरा के तहत जम्मू-कश्मीर को यह सुविध प्रदान की गई कि वह भी अपना एक संविधन अलग से बना ले और जम्मू-कश्मीर के इसी संविधन की प्रस्तावना में यह लिखा हुआ है कि ‘हम जम्मू तथा कश्मीर राज्य के लोग इस राज्य के भारत के साथ विलय के, जो 26 अक्टूबर 1947 को हुआ था, अनुसरण में इस राज्य की भारत संघ के साथ उसके अभिन्न अंग के रूप में वर्तमान संबंधें की आगे परिभाषा करने का दृढ़ संकल्प लिए हुए हैं।’ भारत की संविधन सभा में भी गोपालस्वामी आयंगर ने अपने भाषण के अंत में सापफ कर दिया था कि ‘जब राज्य की संविधन सभा बैठ जाए और राज्य के संविधन के लिए और राज्य पर पफेडरल क्षेत्राध्किार की सीमा के संबंध् में अपना निश्चय कर चुके तो इस संविधन सभा की सिपफारिश पर राष्ट्रपति एक आदेश निकालेंगे कि यह अनुच्छेद 306ए ;जो अब धरा 370 हैद्ध या तो प्रवृत्त न रहेगा अथवा केवल ऐसे अपवादों और उपभेदों के अध्ीन प्रवृत्त होगा जो राष्ट्रपति द्वारा उल्लेख किए गए हों।’ कोई शक नहीं कि धरा 370 को समाप्त करने के लिए देश की संसद को जिस कानूनी पृष्ठभूमि की ”ारूरत है, उस पृष्ठभूमि को, गोपालस्वामी आयंगर के बयान और जम्मू-कश्मीर के संविधन की प्रस्तावना को एक साथ मिलाकर पढ़ा जाए तो वह देश को सहज रूप से उपलब्ध् है और इसका उपयोग कर संसद जब चाहे धरा 370 को समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू कर सकती है और उसे समाप्त कर सकती है। तो प्रश्न उठता है कि जब स्थितियां इतने सहज रूप से उपलब्ध् हैं, जब संपूर्ण देश का मानस धरा 370 के खिलापफ बन चुका है, जब यह शीशे की तरह सापफ हो चुका है कि कश्मीर घाटी के अलगाववादी और भारतद्रोही नेताओं ने इस धरा का उपयोग सिपर्फ और सिपर्फ कश्मीर को भारत से अलग करने की अपनी कुत्सित राजनीति चमकाने में किया है, ऐसे में इस धरा को संविधन से अपेंडिक्स की तरह निकालकर बाहर पफेंकने में अड़चन क्या है? संविधन विशेषज्ञ सुभाष कश्यप इसे वोट बैंक की मजबूरी मानते हैं, उनका कहना है कि देश और घाटी के सभी राजनीतिक दल इसे वोटों के चश्मे से ही देखने के अभ्यस्त हो चुके हैं और उनमें साहस नहीं आ रहा कि वे अपने को बदलें और भारत की एकता और अखंडता के संदर्भ में सोचने का अभ्यास डालें। रूटस इन कश्मीर संगठन के प्रवक्ता आदित्य राज कौल का मानना है कि अलगाववादी नेताओं ने धरा 370 का राजनीतिक दुरुपयोग इस हद तक कर लिया है कि उन्होंने श्रीअमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी जाने वाली जमीन के मसले को भी बिना किसी कठिनाई के और बड़े ही आराम से अपनी अलगाववादी राजनीति में ढालकर घाटी की पूरी मुस्लिम जनता को सड़क पर ला खड़ा कर दिया है। इन दोनों विचारकों द्वारा दिए गए कारण की मीमांसा की जाए तो एक ही बात समझ में आती है कि धरा 370 हटाने की बात करते ही जहां जम्मू, लद्दाख और शेष भारत में स्वीकृति और खुशी की लहर उमड़ पड़ेगी, वहीं घाटी की मुस्लिम आबादी इसके विरोध् में सड़कों पर हिंसक आंदोलन करती नजर आएगी। भारत की मुस्लिम राजनीति पर जिन क्षुद्र और संकीर्ण नेताओं का इस समय कब्जा है, वे, तथा घाटी और पूरे भारत में आतंकवादी हिंसाकांड करने वाले तत्व इसे तुरंत एक मुस्लिम तथा अल्पसंख्यक और मानवाध्किार का प्रश्न बनाकर उभार देंगे। भारत के वे तमाम राजनीतिक दल जो ध्र्मनिरपेक्षता की आड़ में और अल्पसंख्यकों के हितचिंतक होने का नारा लगाकर देश के बारह-तेरह प्रतिशत मुस्लिम वोट पर आंख गड़ाए रहते हैं, वोटबैंक की राजनीति करने वाले ऐसे तमाम दलों की पूरी राजनीति ही खत्म हो जाएगी और वे नेता और वे दल ऐसा भला क्यों होने देना चाहेंगे? अर्थात शु( वोटबैंक की राजनीति के कारण देश के तमाम राजनीतिक दल धरा 370 को खत्म करने का नाम भी नहीं लेते और वे कश्मीर को अलगाववादी और भारतद्रोही नेताओं के हाथों गिरवी जाता हुआ टुकुर-टुकुर देख रहे हैं, लेकिन अपनी राजनीति से बाज नहीं आ रहे। कभी धरा 370 को हटाने की बढ़-चढ़कर बातें करने वाली भाजपा भी अब इसी वोटबैंक राजनीति का एक हिस्सा बन चुकी है। यह इसी बात से जाहिर है कि वह श्रीअमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी जाने वाली जमीन के मामले पर तो खूब शोर मचा रही है, लेकिन धरा 370 के नाम पर उसने भी चुप्पी साध् रखी है। भाजपा के इस रुख ने विस्थापन का जीवन जी रहे कश्मीरी पंडितों को और देशप्रेमियों को हताश कर दिया है। केंद्र में राजग के सत्ता में आने से इन पंडितों और भारत की एकता में विश्वास रखने वालों के दिलों में एक उम्मीद जगी थी कि अब धरा 370 पर कोई निर्णायक कदम उठाया जाएगा। लेकिन राजग का हिस्सा बनने की एक शर्त के रूप में भाजपा ने अपना यह मुद्दा छोड़ने में पलक झपकने जितनी देर भी नहीं लगाई और अपनी भूमिका को दूसरे राजनीतिक दलों की तरह संदिग्ध् बना दिया। भारत के राजनीति दलों के वोटबैंक का इस कदर शिकार हो जाने के कारण धरा 370 पर चुप्पी साध् लेने का ही नतीजा है कि कश्मीर की पीडीपी और नेशनल कांÚेंस जैसी मुख्यधरा पार्टिंयों को भी अब अलगाववादी और भारतद्रोही राजनीति करने में कोई हर्ज महसूस नहीं हो रहा। जो नेशनल कांÚेंस कभी पाकिस्तान को दुश्मन नंबर एक करार देती थी, वह अब पाकिस्तान परस्त गिलानी की हमसपफर बन गई नजर आ रही है। जो पीडीपी नेता मुफ्रती मोहम्मद सईद कभी भारत के गृहमंत्राी के रूप में भारत की एकता की कसमें खाते थकते नहीं थे, वही मुफ्रती आज आतंकवादियों और पाकिस्तान परस्त अलगाववादियों की पैरवी करने वाली पार्टी के नायक बन चुके हैं। जब भारत के सभी राजनीतिक दल और राजनेता वोटबैंक की राजनीति का शिकार हो चुके हों और कश्मीर घाटी की मुख्यधरा पार्टियां अलगाववादियों और आतंकवादियों की हमसपफर बनने को तैयार हो चुकी हों, ऐसे में भारत की एकता और अखण्डता की चिंता भला किसे हो सकती है? जब मानसिकता यह हो, ऐसे में धरा 370 को खत्म करने के लिए कोई भी नेता या दल अपना कदम क्यों आगे बढ़ाएगा? और कैसे? इस सबके बावजूद अगर कश्मीर घाटी भारत का हिस्सा बनी रही तो इस चमत्कार की सिपर्फ एक ही वजह होगी और उस वजह का नाम है - भारत की जांबाज सेना, जिस पर भारत की जनता का भरोसा हमेशा की तरह बदस्तूर कायम है।
धरा 370 के पक्ष में नहीं थे आम्बेडकर
डाॅ. भीमराव आम्बेडकर की ख्याति एक राष्ट्रवादी देशभक्त की है। वे स्वतंत्रा भारत के पहले कानून मंत्राी थे और संविधन का ड्राफ्रट बनाने वाली कमेटी के अध्यक्ष भी। उन्हें यह बात सिरे से ही स्वीकार नहीं थी कि जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष संवैधनिक अध्किार प्रदान किए जाएं, क्योंकि वे भारत के सभी राज्यों के लिए हर तरह की संवैधानिक समानता के प्रबल पक्षध्र थे। वैसे भी न तो जम्मू-कश्मीर के लोगों ने और न ही संविधन में उल्लिखित ‘हम भारत के लोगों’ ने ऐसी कोई मांग रखी थी कि जम्मू-कश्मीर को विशेष संवैधनिक अध्किार दिए जाएं। जब शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने डाॅ. आम्बेडकर के पास जाकर संविधन में जम्मू-कश्मीर के लिए विशेष अध्किारों की मांग की तो डाॅ. आम्बेडकर का जवाब कुछ इस तरह का था - ‘आप चाहते हैं कि भारत कश्मीर की रक्षा करे, पूरे भारत में कश्मीरियों को हर तरह के समान अवसर प्रदान किए जाएं, लेकिन आप भारत और भारतीयों को वही अध्किार कश्मीर में नहीं देना चाहते। मैं भारत का कानूनमंत्राी हूं और राष्ट्रीय हितों के खिलापफ किसी भी तरह की गतिविध् िमें मेरी हिस्सेदारी हो ही नहीं सकती।’ जब भारत के विश्वविख्यात विध्मिंत्राी और संविधन-निर्मात्राी समिति के अध्यक्ष की राय यह हो तो यह सचमुच एक षड्यंत्रा सरीखा ही लगता है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू के कहने पर एन गोपालस्वामी आयंगर ने संविधन के प्रारूप में धरा 306-ए का प्रस्ताव रखा और 17 अक्टूबर 1949 के दिन संविधन सभा के पटल पर उस प्रस्ताव का रखा जाना, उस पर बहस और उसकी स्वीकृति सब एक साथ हो गए और इसी धरा को तब धरा 370 का नाम दिया गया।
धरा 370 के पक्ष में एक कुतर्क
कई बार यह तर्क दिया जाता है कि जम्मू-कश्मीर के लिए बनाई गई धरा 370 पर इतना शोर मचाने की जरूरत क्या है क्योंकि, महाराष्ट्र, गुजरात, नगालैंड, असम, मणिपुर, आंध््र प्रदेश, सिक्किम, मिजोरम, अरुणाचल और गोवा के लिए भी तो संविधान की धरा 371 और धरा 371-ए के अंतर्गत विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं। ऐसा तर्क देने वाले यह बात भूल जाते हैं कि इन सभी राज्यों के लिए की गई व्यवस्थाएं कुछ इस प्रकार की हैं कि वहां किसी वर्ग विशेष को ऐतिहासिक कारणों से अगर सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक पिछड़ापन झेलना पड़ रहा है और सामान्य कानूनी प्रावधनों से उन्हें दूर करना आसान नजर नहीं आ रहा तो इन राज्यों के लिए संविधन की धरा 371 का उल्लेख करते हुए ऐसे विशेष प्रावधन किए जा सकते हैं जिनकी सहायता से इस पिछड़ेपन को दूर किया जा सके। अर्थात इन राज्यों के लिए किए गए प्रावधन में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि धरा 371 और धरा 371-ए केंद्र सरकार के हाथ बांध् देती हो या सत्ता के दो समानान्तर केंद्रों को जन्म दे देती हो। केंद्र जब चाहे धरा 371 और धरा 371-ए में परिवर्तन, संशोध्न इत्यादि कर सकता है और इसके लिए इन राज्यों से अनमुति जैसी लेने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके विपरीत धरा 370 देश में दो संविधनों और दो सत्ता केंद्रों को जन्म देने का कारण बनी है और इसी धरा के कारण केंद्र सरकार का कोई भी कानून तब तक जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं हो सकता जब तक जम्मू-कश्मीर की विधनसभा उसे स्वीकार न कर ले।
धरा 370: एक संवैधनिक विसंगति
धरा 370 इस हद तक गैरकानूनी जैसी नजर आती है कि यह एक ही देश के नागरिकों में असमानता, विभाजन और एकता-विरोध्ी वातावरण का निर्माण करती है तथा एक ही देश के नागरिकों को अलग-अलग वर्गों में रख देती है। यह धरा भारत के संविधन की मूलभूत संरचना के भी खिलापफ है क्योंकि यह देश के संविधन को उन संप्रभु शक्तियों से वंचित कर देती है जो शक्तियां उसे संविधन सभा ने प्रदान की थीं। मसलन भारत के किसी भी अन्य राज्य के लिए अलग से संविधन सभा नहीं बनाई गई लेकिन जम्मू-कश्मीर के लिए अलग से संविधन सभा बना दी गई। भारत के किसी भी अन्य राज्य के लिए अलग संविधन की व्यवस्था नहीं है, किन्तु जम्मू-कश्मीर के लिए अलग संविधन की व्यवस्था कर दी गई। यहां तक कि भारत के संविधन को इस संप्रभु अध्किार से भी वंचित कर दिया गया है कि वह जम्मू-कश्मीर के लिए बनाई गई इस धरा को समाप्त कर सके या इसमें कोई संशोध्न ला सके। अगर कभी भारत सरकार को धरा 370 को समाप्त करना पड़े तो वैसा करने के लिए व्यवस्था यह है कि सबसे पहले जम्मू-कश्मीर राज्य की विधनसभा इस तरह का एक प्रस्ताव पारित करेगी। विधनसभा अगर अस्तित्व में नहीं है तो वैकल्पिक तौर पर वहां के राज्यपाल जम्मू-कश्मीर संविधन की धरा 91 और 92 के तहत सम्पूर्ण विधयी और कार्यकारी शक्तियां अपने हाथों में लेते हुए इस तरह का एक प्रस्ताव राष्ट्रपति के पास भेज सकते हैं। उसके बाद भारत के राष्ट्रपति को वह प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों के पास भेजना होगा। उसके बाद संविधन की धरा 356 के तहत जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लागू कर भारत की संसद को जम्मू-कश्मीर के लिए कानून बनाने का अध्किार अपने हाथ में लेना होगा। इसके बाद ही भारत की संसद में उस प्रस्ताव पर कोई विचार-विमर्श या पफैसला किए जा सकते हैं।
जरूरत इच्छा शक्ति की
गुलाम मोहम्मद सादिक संविधन की धरा 370 को समाप्त करने पर हमेशा से आमादा रहे थे, किन्तु वे अपनी इस विचारधरा को अपनी ही पार्टी यानी कांग्रेस से कभी मनवा नहीं पाए। इसके बावजूद 1963 में वे जम्मू-कश्मीर विधनसभा से एक प्रस्ताव पास करवाने में सपफल हो गए। इस प्रस्ताव के पास होने से पहले जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्राी को वहां का प्रधनमंत्राी और वहां के राज्यपाल को वहां का सदरे रियासत ;यानी वहां का राष्ट्रपतिद्ध कहा जाता था। इस संविधन संशोध्न के बाद प्रधनमंत्राी को और सदरे रियासत को उसी तरह से क्रमशः मुख्यमंत्राी और राज्यपाल कहा जाने लगा जैसा कि भारत के अन्य राज्यों में मुख्यमंत्राी और राज्यपाल को कहा और जाना जाता है। मानो इसी संशोध्न से प्रेरणा लेकर 1964 में तब के प्रखर वक्ता और राष्ट्रवादी सांसद प्रकाशवीर शास्त्राी ने लोकसभा में धरा 370 को खत्म करने के लिए बकायदा एक संविधन संशोध्न प्रस्ताव रखा। जाहिर है कि प्रस्ताव गिर गया, परंतु उस संदर्भ में तब के केंद्रीय गृहमंत्राी गुलजारी लाल नंदा ने कहा कि इस धरा को खत्म करने के लिए किसी संविधन संशोध्न लाने और उस पर बहस की जरूरत ही नहीं है क्योंकि राष्ट्रपति एक अध्यादेश जारी कर इसे जब चाहें समाप्त कर सकते हैं। देश वास्तव में जानना चाहता है कि क्या कानूनी स्थिति वास्तव में ऐसी ही है, और अगर इसका जवाब ‘हां’ है ;वैसे हमें शक हैद्ध तो वह सौभाग्यशाली दिन देश को कब देखने को मिलेगा जिस दिन भारत का राष्ट्रपति ऐसा अध्यादेश जारी कर देगा? कश्मीर घाटी की आज की हालत को देखते हुए देश वास्तव में जानना चाहता है कि अगर कानूनी स्थिति ऐसी ही है तो हमारे मौजूदा राष्ट्रपति को ऐसा अध्यादेश जारी करने के लिए और किस बात का इंतजार है?
बुधवार, 17 सितंबर 2008
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1 टिप्पणी:
इससे बड़ी समस्या अधिकारियों और राजनेताओं का भ्रष्टाचार है ..देश की समस्याओं के समाधान और उन पर ध्यानाकर्षण के सम्बन्ध में प्राथमिकताएं निर्धारित की जानी चाहिए ...
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