बनाइए धरा 370 को चुनावी मुददा
क्या कश्मीर एक मुस्लिम प्रश्न बन चुका है? ध्र्मनिरपेक्षता के नाम पर छाती कूटने वाले लोग हमारे इस सवाल से ही विलाप करने लगेंगे और हमें विशु( साम्प्रदायिक कहकर अपनी खीझ मिटाने निकल पड़ेंगे। लेकिन जब देश के शिखर से देश को तोड़ने की ध्मकियां जारी की जा रही हों, तब इस तरह के विकलांग आरोपों की परवाह किए बिना सही सोच के लोगों को सामने आकर पूछना ही पड़ता है - ‘क्या कश्मीर वास्तव में एक मुस्लिम प्रश्न बन चुका है?’ हमारा मतलब कश्मीर घाटी से है। हमारा मन भी यह कहने को करता है कि काश, कश्मीर मुस्लिम प्रश्न न बन चुका होता, क्योंकि हम भी दूसरे भारतीयों की तरह इस देश की बहुलवादी विरासत के कायल हैं और उसी के बने रहने में ही देश के अस्तित्व के बने रहने की अवधरणा के समर्थक हैं। लेकिन क्या किया जाए, जब कश्मीर का हर दूसरा नेता, बड़ा भी और छुटभैया भी, कश्मीर को सिपर्फ और सिपर्फ मुस्लिम प्रश्न बनाने पर आमादा हो, देश का हर राजनेता कश्मीर को मुस्लिम प्रश्न बनते हुए टुकुर-टुकुर देखने को मजबूर हो, देश का तमाम मुस्लिम नेतृत्व इस पर चुप्पी साध्े बैठा हो तो देश और संविधन से प्यार करने वालों को भविष्य के खतरों से आगाह करने के लिए हम जैसों को यह सवाल पूछने को मजबूर होना पड़ता है। न बन चुका होता तो क्यों कश्मीर की पीडीपी जैसी मुख्यधरा पार्टी अमरनाथ श्राइन बोर्ड को 100 एकड़ जमीन देने को कश्मीरियत पर हमला बताती? अमरनाथ का मंदिर कश्मीर में है, अमरनाथ मंदिर के लिए बनाया गया श्राइन बोर्ड जम्मू-कश्मीर विधनसभा की कानूनी संतान है, श्राइन बोर्ड को दी जाने वाली जमीन पर कब्जा किसी गैर-कश्मीरी का नहीं होने वाला। पिफर क्या वजह है कि अमरनाथ श्राइन बोर्ड को अस्थायी तौर पर दी जाने वाली जमीन को भी कश्मीरियत पर हमला माना गया? हमें कश्मीर के अलगाववादियों और दूसरी पार्टियों के नेताओं का शुक्रगुजार होना चाहिए कि वे कांग्रेस, भाजपा, लेफ्रट या सपा नेताओं की तरह दोमुंही बात नहीं करते। उन्होंने सापफ-सापफ कह दिया कि अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी जाने वाली जमीन से कश्मीर की ‘डेमोग्रापफी’ यानी जनसंख्या-चरित्रा में पफर्क आ जाएगा। इस तर्क को समझने में ज्यादा मुश्किल नहीं आती। जाहिर है कि अमरनाथ मंदिर की यात्रा करने वाले सिपर्फ और सिपर्फ हिंदू होते हैं और वे भारत के विभिन्न भागों से वहां जाते हैं। उस 100 एकड़ जमीन पर अगर अमरनाथ मंदिर की यात्रा करने के लिए जाने वाले यात्राी दो या तीन महीने के लिए वहां आते-जाते, रहते रहेंगे तो निश्चित ही कुछ समय के लिए कश्मीर घाटी में कुछ लाख हिन्दू, भले ही दो या तीन महीने के लिए, रह रहे होंगे। वे वहां स्थायी रूप से नहीं रहेंगे, यह जानते-बूझते हुए भी अगर पीडीपी और हुर्रियत के नेता भारत के इन हिन्दुओं के इस अस्थायी आवागमन को भी जनसंख्या चरित्रा में खलल मानते हैं तो संदेश सापफ है कि कश्मीरी राजनेता और अलगाववादी अब घाटी में अस्थायी रूप से भी किसी हिन्दू के रहने को बर्दाश्त नहीं कर सकते। इस समय कश्मीर घाटी की लगभग तमाम जनसंख्या मुस्लिम है और इस तर्क का अर्थ यही निकलता है कि कश्मीर के सभी राजनेता और अलगाववादी इस बात पर एकमत हैं कि कश्मीर घाटी में सिपर्फ और सिपर्फ मुस्लिम आबादी ही बसनी चाहिए, किसी गैर-मुस्लिम को अस्थायी रूप से भी वहां नहीं रहने दिया जाना चाहिए। अगर इस तर्क को समझने में किसी कथित ध्र्मनिरपेक्ष दिमाग को मुश्किल आ रही हो तो उसकी मुश्किल को दूर करने के लिए हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी ने एक रैली में सापफ तौर पर कह दिया कि हम कश्मीर के लोग मुसलमान हैं, पाकिस्तान एक इस्लामिक देश है और मुसलमान होने के नाते हम भारत की बजाए पाकिस्तान के साथ ज्यादा सहज और स्वाभाविक अनुभव करते हैं इसलिए कश्मीर को भारत से अलग होकर पाकिस्तान का हिस्सा बन जाने में ही कश्मीरियों को ठीक अनुभव होगा। इतना घनघोर सांप्रदायिक बयान देने वाले अलगाववादी गिलानी यह बयान देने के बाद आराम से अपने घर चले जाते हैं। वे गिरफ्रतार नहीं होते, उन पर देशद्रोह का कोई मुकदमा नहीं चलता। इस सबका क्या अर्थ निकाला जाए? इसका एक और सिपर्फ एक ही मतलब निकलता है कि शायद भारत सरकार गिलानी के इन उद्गारों को गैरकानूनी उद्गार नहीं मानती, उनके इस बयान को देशद्रोह की परिभाषा में नहीं रखती और इसलिए कोई आश्चर्य नहीं होगा कि भविष्य में होने वाले किसी कश्मीर-संवाद में यही देशद्रोही गिलानी भारत सरकार के सम्मानित अतिथि के रूप में शिरकत करते आपको न”ार आएं। कश्मीर की पीडीपी जैसी पार्टियां हुर्रियत सरीखे अलगाववादियों के सुर में सुर मिलाते हुए, कश्मीर के मुस्लिम चरित्रा को रेखांकित करते हुए, उसे बरकरार रखने को सड़कों पर हिंसा करने निकल आती हैं। इस मुस्लिम चरित्रा को गर्व से भरी अपनी शब्दावली में पेश करते हुए गिलानी पाकिस्तान में मिल जाने का आह्वान करते हैं। यानी देश के ध्र्मनिरपेक्ष संविधान की खुली अवज्ञा कश्मीर की सड़कों पर होती है, देशद्रोह के लिए खुला आह्नान कश्मीर की सड़कों पर किया जाता है, और ये दोनों काम मुस्लिम आबादी के नाम पर किए जाते हैं। इसके बावजूद देश का संपूर्ण मुस्लिम नेतृत्व मुंह पर पट्टी बांध्े रहता है, एक शब्द अपने मुंह से नहीं निकालता, इसकी निंदा करने का तो सवाल भी दूर-दूर तक नहीं उठता। इस सबका क्या मतलब निकाला जाए? इसका एक ही मतलब निकलता है और वह मतलब वही है जिसकी ओर हमने अपने इस आलेख के शुरू में ही एक सवाल उठाकर इशारा किया है। हम पिफर से सवाल पूछ रहे हैं कि क्या कश्मीर एक मुस्लिम प्रश्न बन चुका है? ऊपर दिए गए तर्कों की श्रृंखला को देखते हुए अगर अब भी किसी को इस प्रश्न पर ऐतराज हो, या उसे यह प्रश्न गलत लगता हो, या किसी को यह प्रश्न अनावश्यक लगता हो तो हम इस पर बहस के लिए तैयार हैं। क्योंकि हमें यह सापफ-सापफ लग रहा है कि कश्मीर एक मुस्लिम प्रश्न बन चुका है, बावजूद इसके कि सम्पूर्ण जम्मू-कश्मीर राज्य में हिंदू पर्याप्त संख्या में हैं, वहां बौ(ों की भी अच्छी-खासी संख्या है, इसके बावजूद हमें सापफ लग रहा है कि कश्मीर यानी कश्मीर घाटी एक मुस्लिम प्रश्न बन चुका है। अगर हमारा यह निष्कर्ष गलत है तो हमें खुशी होगी। हम चाहते हैं कि हमारा यह निष्कर्ष गलत हो, क्योंकि भारत के करोड़ों लोगों की तरह हमारी आस्था भी भारत के बहुलतावादी स्वरूप में है और हम नहीं चाहते कि भारत का कोई एक राज्य या कोई एक इलाका ध्र्म या जाति की दृष्टि से एक सरीखी जनसंख्या वाला होकर भारत के सम्पूर्ण संवैधनिक आकार को सै(ांतिक चुनौती जैसी देने लगे। इसलिए हम वास्तव में चाहते हैं कि हमारा निष्कर्ष गलत हो। लेकिन कश्मीर की स्थितियां जिस कदर मुंह बाए हमारे सामने खड़ी हैं उसे देखते हुए हमारे चाहने या न चाहने से क्या पफर्क पड़ने वाला है? कश्मीर हर हिसाब से एक मुस्लिम प्रश्न बना दिया गया है जो कि संविधन के खिलापफ है और देश की राजनीति उसे मुस्लिम प्रश्न नहीं बना रहने देगी, इसे साबित करने के लिए हमें यह देखना होगा कि क्या आगामी लोकसभा चुनावों में कोई पार्टी धरा 370 को खत्म करने का वायदा करने के नाम पर चुनाव मैदान में उतरती है या नहीं। कश्मीर एक मुस्लिम प्रश्न बना रहेगा या नहीं, इसकी कसौटी हम इस बात में क्यों ढूंढ रहे हैं कि आगामी लोकसभा चुनावों में कोई पार्टी धरा 370 खत्म करने को चुनावी मुद्दा बनाती है या नहीं? इसलिए कि हमें इस सवाल का जवाब नहीं मिल पा रहा कि संविधन स्वीकार हुए आध्ी सदी से ज्यादा समय बीत चुका और क्यों कोई पार्टी या सरकार इस धरा को खत्म करने के सवाल पर कुछ बोलने को तैयार नहीं हो रही? हम जानते हैं कि यह धरा आज भी भारत के संविधन में अस्थायी धरा के रूप में ही लिखी पड़ी है। तो पिफर क्या कारण है कि इस अस्थायी धरा का जीवन इतना लंबा होने दिया गया और आज हालत यह बना दी गई है कि देश का कोई भी प्रमुख राजनीतिक दल और केंद्र में शासन करने वाली कोई भी पार्टी या गठबंध्न की सरकार इस धरा को खत्म करने की बात तक जुबान पर नहीं लाती? एक जमाना था जब सांप्रदायिक होने के आरोप की लाठी खाते हुए भी भाजपा इस धरा को खत्म करने की बड़कें मारा करती थी। लेकिन वह भी इस लाठी की मार बहुत दिनों तक नहीं सह सकी और एनडीए का अंग-प्रत्यंग बनने के उत्साह में उसने अपनी इस बड़क से तौबा कर ली। और यह तब है जब सारा देश यह देखने को बाध्य हैै कि कश्मीर में आज जो भी अलगाववाद है, जो भी पाकिस्तान-प्रेरित आतंकवाद है, जो भी कश्मीरियत की दुर्भाग्यपूर्ण साम्प्रदायिक परिभाषा की जा रही है, जितने भी देशद्रोहपूर्ण भाषण वहां दिए जा रहे हैं, भारत से आजाद होने के नाम पर जितनी रैलियां और उपद्रव वहां किए जा रहे हैं, इस सबके बावजूद देशद्रोही और अलगाववादी नेताओं पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा पा रही। इन सबका एक ही कारण है और उस कारण का नाम है - ‘धरा 370’। हमारे इस आलेख के साथ जितने भी अन्य आलेख और रिपोर्र्टें आवरण कथा के हिस्से के रूप में पाठकों के सामने हैं, उन सभी का निष्कर्ष एक ही है कि कश्मीर की मौजूदा हालत का कारण और उस हालत को ठीक न कर पाने में भारत की हर केंद्रीय सरकार की असपफलता और विवशता, इन सभी का एकमात्रा कारण है - ‘धरा 370’। इसलिए हमें यह देखकर हैरानी होती है कि जब सारा देश लगभग एक ही तरह का निष्कर्ष निकालने की स्थिति में आ चुका है तो भी संविधन में वह धरा अभी तक क्यों चलने दी जा रही है, जिसे एक अस्थायी व्यवस्था के रूप में संविधन निर्माताओं ने भारत की इस पवित्रा पुस्तक का हिस्सा बनाया था? आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्यों कोई भी पार्टी इस अस्थायी संवैधनिक उपबंध् को खत्म करने के लिए हिम्मत नहीं जुटा पाती? देश में ऐसी कौन-सी खौपफनाक हालत है कि हर पार्टी और हर सरकार इस धरा को लेकर होंठ सिले रहती है? ऐसी कोई खौपफनाक हालत देश में नहीं है। पर हमें जो बात समझ में आ रही है और हम चाहते हैं कि हमारी यह समझ गलत साबित हो, लेकिन दुर्भाग्यवश वह समझ गलत साबित होती हुई नजर नहीं आ रही कि कोई भी राजनीतिक दल सिपर्फ इसलिए इस धरा को खत्म करने की बात नहीं करता क्योंकि हर पार्टी को डर है कि वैसा होते ही देश की तेरह पफीसदी मुस्लिम आबादी उस पार्टी के खिलापफ हो जाएगी और उसे मुस्लिम वोट बैंक से हाथ धेना पड़ेगा। हम पिफर से चाहते हैं कि हमारा यह कारण-परिणाम-विवेचन गलत साबित हो जाए, लेकिन हमें धरा 370 के लगातार चलते रहने का और कोई कारण भी समझ नहीं आ रहा और हम वास्तव में जानना चाहेंगे कि इसके अलावा और क्या कारण इस धरा के चलते रहने का हो सकता है। हम अपने बताए इस कारण को सिरे से नकारने की हालत में आ जाते अगर कश्मीर को एक मुस्लिम प्रश्न बनने की हद तक विकराल न बना दिया गया होता। भारत का मुस्लिम नेतृत्व अक्सर शिकायत करता है कि मुसलमानों से ही इस बात की अपेक्षा हमेशा क्यों की जाती है कि वे देशभक्ति का प्रमाण प्रस्तुत करें? क्यों आतंकवाद के मामले में मुस्लिम आबादी को ही हमेशा शक के घेरे में रखा जाता है? हम भारत के मुस्लिम नेतृत्व की इस शिकायत से सौ पफीसदी सहमत हैं। लेकिन उसी मुस्लिम नेतृत्व से हमारे दो प्रश्न मौजूदा हालात को लेकर भी हैं। जितने भी आतंकवादी संगठन, पिफर चाहे वे भारत के हों या पिफर भारत से बाहर के, भारत पर आतंकवादी हमले करते रहते हैं और उन हमलों की जिम्मेवारी भी गर्वपूर्वक लेते रहते हैं, वे सभी मुस्लिम संगठन हैं और अब तो उनमें से कुछ संगठन भारत में निजामे-मुस्तपफा लाने के इरादों की घोषणाओं के साथ आतंकवादी हमले कर रहे हैं। पर भारत के मुस्लिम नेतृत्व द्वारा इन आतंकवादी संगठनों के खुलेआम विरोध् का अभी भी हमको इंतजार है। निस्संदेह धर्मिक स्तर पर कुछ पफतवे आतंकवाद के खिलापफ जारी हुए हैं। लेकिन मुस्लिम नेतृत्व से इससे आगे बढ़कर कुछ ठोस राजनीतिक कदम उठाने का इंतजार देश को बना हुआ है। हमारा दूसरा सवाल कश्मीर के संदर्भ में है। कश्मीर के तमाम अलगाववादी नेता इस्लाम की दुहाई देकर भारत से अलग होने और पाकिस्तान में मिलने की घोषणाएं खुलेआम कर रहे हैं, किन्तु देश के मुस्लिम नेतृत्व ने ऐसी किसी घोषणा के खिलापफ कोई ठोस राजनीतिक कदम अभी तक नहीं उठाया। जाहिर है कि निहित स्वार्थों द्वारा आतंकवाद और कश्मीरी अलगाववाद हर हिसाब से मुस्लिम प्रश्न बना दिए गए हैं और हर मुस्लिम प्रश्न पर बढ़-चढ़कर बोलने वाले भारतीय मुस्लिम नेतृत्व की इन दोनों मसलों पर राजनीतिक चुप्पी और निष्क्रियता किसी भी हिसाब से तर्कपूर्ण नहीं मानी जा सकती। ऐसे में अगर कोई भी राजनीतिक पार्टी या केंद्र सरकार धरा 370 खत्म करने की दिशा में कोई भी कदम उठाने की हिम्मत नहीं कर पा रही तो जाहिर है कि उनकी इस राजनीति को मुस्लिम नेतृत्व की तर्कहीन चुप्पी के संदर्भ में ही पढ़ा जाना चाहिए। हमें पूरा विश्वास है कि जैसे ही भारत का मुस्लिम नेतृत्व इन दोनों मसलों पर ठोस राजनीतिक पहल करेगा, देश के राजनीतिक सोच की पिफ”ााँ ही बदल जाएगी। मुस्लिम नेतृत्व की बात अगर एक ओर रख दी जाए, तो आज संपूर्ण देश का मानस ऐसा बन चुका है कि वह एक क्षण के लिए भी धरा 370 को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। इसलिए अगर कांग्रेस या भाजपा या कोई भी राजनीतिक दल अगले चुनाव में देश की जनता को यह विश्वास दिलाने में सपफल हो गया कि आप हमें तीन चैथाई या दो तिहाई बहुमत दीजिए, और हम आपको भरोसा दिलाते हैं कि सत्ता में आते ही पहला काम यह किया जाएगा कि इस धरा को संविधान से निकाल बाहर कर दिया जाएगा, उस पार्टी को यकीनन इतना बहुमत आसानी से मिल जाने वाला है। देश वाकई अब धरा 370 से आजिज आ चुका है।
बुधवार, 17 सितंबर 2008
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