गुरुवार, 21 अगस्त 2008

बनिहाल टनल के उस पार है इंडिया


बनिहाल टनल के उस पार है इंडिया

बिशन कुमार

नगर की अलस्सुबह। दिन की गहमा-गहमी अभी शुरू नहीं हुई है। लाल चैक में टाटा सूमो पर जम्मू जाने वाली सवारियां चढ़ रही हैं। एक लड़का ते”ा आवा”ा लगा रहा है - जम्मू, जम्मू। अब्दुल वाहिद अटैची लेकर दौड़ता है और सूमो की अगली सीट पर जम जाता है। एक दोस्त उसे देख दुआ सलाम कर पूछता है, कहां जा रहे हो। वाहिद अपनी ”ाुबान कश्मीरी में जवाब देता है - इंडिया। यह किसी पिफल्म की अति नाटकीय स्क्रिप्ट नहीं है। यह एक ऐसा सच है जो लाल चैक से लेकर बटमालू बस अड्डे तक रो”ा घटता है। आम कश्मीरी के ‘देश’ की सरहद बनिहाल टनल के इस तरपफ खत्म हो जाती है और टनल के उस तरपफ है इंडिया। यह पफासला भौगोलिक नहीं बल्कि मानसिक है। इंडिया और कश्मीर के बीच का प़फासला आ”ाादी के 61 वर्षों बाद भी कम नहीं हुआ - बल्कि और गहरा हुआ है। कश्मीरियों के लिए आज भी ‘इंडिया’ एक ऐसी शय है जिसके साथ रहना उनकी मजबूरी है। इस मजबूरी का खूब प़फायदा उठाया पाकिस्तान ने और दिल्ली में बैठे हुक्मरानों और कश्मीर में थोपी गई पिट्ठू सरकारों ने दिशाहीन नीतियों के चलते कश्मीर और इंडिया के बीच न तो ”ामीनी दूरी कम करने की कोई सार्थक पहल की और न ही जेहानी। हालात इतने बदतर होते गए कि जो भी इंडिया के करीब दिखा, वह कश्मीरियों का दुश्मन बन गया - चाहे वह टनल के उस पार रहने वाले हिंदू हों या लद्दाखी बौ(। जम्मू और लद्दाख के बाशिंदे तो अपने लिए कश्मीर से अलग क्षेत्राीय स्वायत्तता की मांग करते आ रहे हैं। उन्हें कतई विश्वास नहीं कश्मीरी नेताओं पर। वे मानते हैं कि घाटी में बसे कश्मीरी मुस्लिम कभी भी उनके हित की बात नहीं सोच सकते। लगभग डेढ़ दशक पहले कश्मीरियों और बौ(ों के बीच टकराव इस कदर बढ़ गया था कि दोनों ने एक दूसरे का सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार कर दिया था - न तो बौ( कश्मीरियों की टैक्सी में बैठते थे और न ही कश्मीरी बौ(ों की दुकानों से सामान खरीदते। खूनी टकराव तक हुए। यह प़फासला अभी तक बरकरार है, हालांकि अब बहिष्कार की नौबत नहीं है। लगभग यही हाल कश्मीरियों और कारगिलियों के बीच है। कारगिल में लगभग सभी शिया मुसलमान हैं, जबकि कश्मीर में सुन्नी। दोनों के आपसी रिश्ते कभी सहज नहीं रहे। दोनों ही एक-दूसरे के बारे में अच्छी राय नहीं रखते। कारगिली शिया मौका मिलते ही कश्मीरियों की बुराई करने लगेगा, वहीं कश्मीरी मुसलमान कारगिली शियाओं के बारे में अनाप-शनाप बोलने लगेगा। शायद यही कारण है कि 1990 से कश्मीर से शुरू हुए तथाकथित ‘”ोहाद’ में कारगिलियों ने कोई हिस्सा नहीं लिया। शायद ही ऐसा मामला सामने आया हो कि जब कोई कारगिली शिया सरहद पार जाकर आतंकवाद का प्रशिक्षण लेने गया हो। ऊंची पहाड़ियों पर बैठे पाकिस्तानी सैनिक भी कुछ बरस पहले तक कारगिल शहर पर लगातार बम गिराते रहते थे। कश्मीर की आ”ाादी की लड़ाई में शामिल न होने की स”ाा मिलती थी शिया मुसलमानों को। जम्मू-कश्मीर के सक्रिय आतंकवादी संगठन भी कश्मीर में बनिहाल टनल के इस पार और उस पार रहने वाले मुसलमानों के बीच प़फर्क करते हैं। कश्मीर में बम पफटने और गोलीबारी की घटनाओं में निर्दोष कश्मीरी भी मारे जाते हैं पर उनका निशाना भारतीय सेना ही होती है। बनिहाल टनल के उस पार पड़ने वाले गांवों-कस्बों में आतंकवादी घटनाओं में जो लोग मरते हैं वे कश्मीरी ”ाुबान नहीं बोलते -चाहे हिंदू हों या मुसलमान। आतंकवादियों की किसी भी तं”ाीम ने हिंदी बोलने वाले मुसलमानों के मरने पर कभी अप़फसोस नहीं जताया। आखिर आम कश्मीरी अपने आपको हिंदुस्तान या भारत का हिस्सा क्यों नहीं मानता? श्रीनगर में इंडियन एक्सपे्रस के ब्यूरो प्रमुख मुजम्मिल जलील का मानना है कि इस मानसिकता को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। इस मानसिकता का बीज 1990 में नहीं पड़ा था, बल्कि सैंकड़ों वर्षों से कश्मीर विदेशी लोगों के आक्रमण और ”यादतियों का शिकार होता रहा। कश्मीरियों से हमेशा दोयम दर्जे के काम कराए जाते थे और प्रशासन के ऊंचे पदों पर उनका कोई हाथ नहीं रहा था। 1947 के बाद भी कश्मीर में कश्मीरी मुसलमानों को कश्मीरी पंडितों की सरमायेदारी में रहना पड़ा। कारण यह है कि मुसलमान मुख्यतः अशिक्षित थे और कश्मीरी पंडित पढ़े-लिखे होने के कारण स्कूल में शिक्षक के पद से लेकर सचिवालय में बाबू से साहब के पदों पर बैठे थे। अपनी ही ”ामीन पर दोयम दर्जे के नागरिक के तौर पर रहने का दुख उन्हें सदियों से सालता रहा था, जिसका विस्पफोट 1989-90 में आतंकवाद के रूप में हुआ। उनका गुस्सा उस दौरान लगाए जाने वाले नारों से सापफ समझ में आता है। ‘कश्मीर में रहना है तो अल्ला हो अकबर कहना होगा’ से लेकर ‘अशि गछि पाकिस्तान, बटो बगर बटनेऊ सान’ ;हमें चाहिए पाकिस्तान, कश्मीरी पंडितों के बगैर, कश्मीरी औरतों के साथद्ध, तक के सप़फर ने बेहद जहरीला वातावरण बना दिया था। कश्मीर मामलों के जानकार मानते हैं कि 1951 से लेकर 1998 तक कश्मीर में हर विधनसभा चुनावों में खुलकर धंध्ली हुई और दिल्ली की पिट्ठू सरकारें गद्दी पर बिठाई गईं। केवल 1977 के चुनाव को लोग कुछ हद तक सापफ-सुथरा मानते हैं। अलगाववादी नेता अब्दुल गनी लोन का कहना था कि कश्मीर की कहानी, वायदा खिलापफी की कहानी है। 1987 में एक ऐसा मौका भारत सरकार के सामने आया था जब कश्मीर की आ”ाादी मांगने वाले नेता मुस्लिम यूनाईटेड Úंट बनाकर चुनाव मैदान में उतरे थे। यानी सैÕयद सलाहुद्दीन, हिजबुल मुजाहिद्दीन का सुप्रीम कंमाडर पीर मोहम्मद युसुपफ शाह भी अमरा कदल क्षेत्रा से चुनाव मैदान में थे और बाकी उम्मीदवार भी उसके साथी थे। मतदान से पहले ही Úंट के सभी उम्मीदवारों और समर्थकों को जेल में ठूंस दिया गया। ”ााहिर है, दिल्ली नहीं चाहती थी कि ये नेता जीतें और सत्ता में भागीदारी करें। ये सभी नेता हार गए। इसी जेल में ही योजना बनी और पांच लोग जेल से छूटने के बाद सीध्े पाकिस्तान गए और हथियार और आ”ाादी का नारा लेकर लौटे। आज खुपिफया एजेंसियों और सेना की ‘वांटेड’ की सूची में जिन लोगों के नाम हैं उनमें से ”यादातर इस चुनाव में मतगणना केंद्रों पर Úंट के उम्मीदवारों के प्रतिनिध्यिों के तौर पर तैनात थे। जेकेएलएपफ के मुखिया यासीन मलिक भी उस चुनाव में सैÕयद सलाहुद्दीन के इलेक्शन एजेंट थे। हाल ही में सैÕयद सलाहुद्दीन ने ‘ग्रेटर कश्मीर’ को दिए इंटरव्यू में कहा है कि 1987 के चुनाव में Úंट अगर जीत जाता तो एसेम्बली में कश्मीर का भविष्य तय करने का अध्किार पाने के लिए एक प्रस्ताव लाया जाता। इसे भारत सरकार बर्दाश्त नहीं करती और एसेंबली भंग कर दी जाती। यहीं से शुरू होती कश्मीर की आ”ाादी की असली लड़ाई। सलाहुद्दीन और उसके साथियों का उद्देश्य उस वक्त तो पूरा नहीं हुआ। बैलेट छोड़कर बुलेट थामने के पीछे मुख्य तौर पर 1987 के चुनाव में Úंट को साजिशन हराना महत्वपूर्ण कारण माना जाता है। कश्मीरी भारत से अपना जुड़ाव महसूस नहीं करता, इसका महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि किसी भी सरकार ने कश्मीरियों के भले का ख्याल नहीं रखा और कश्मीरी को हमेशा शक की न”ार से देखा। अब हालात बदल रहे हैं और आज का युवा कश्मीरी ”ोहादी नारों से बहकता नहीं, बल्कि अपना भविष्य ख़ुद तय करने का अध्किार चाहता है। वह यह तय करने का हक चाहता है कि उसे हिंदुस्तान के साथ रहना है या आजाद होना है। एक साप़फ बदलाव यह भी है कि अध्सिंख्य कश्मीरी पाकिस्तान के साथ नहीं रहना चाहते। महनूर से लेकर आगा शाहिद अली की ग़”ालों में भी वतन के लिए जो तड़प है वह कोई पाकिस्तान की गोद में बैठने के लिए नहीं है, बल्कि सम्मान के साथ जीने के लिए है। इसका हक कश्मीरी चाहते हैं और वह मिलना भी चाहिए। उसका तरीका क्या हो, यह कश्मीरियों के साथ बैठकर तय करना होगा। जब तक यह नहीं होता, हिंदुस्तान बनिहाल टनल के इस पार ही रहेगा।

कश्मीर में कहीं ‘भारत’ दिखाई नही देता

कश्मीर में कहीं ‘भारत’ दिखाई नही देता
नरेन्द्र सहगल
भारत की सरकार, राजनीतिक नेता, धर्मिक/सामाजिक रहनुमा और भारत के लोग भले ही कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग कहते न थकते हों, परंतु जमीनी सच्चाई यह है कि आज का कश्मीर, कश्मीरी और कश्मीरियत भारत, भारतीयों और भारत राष्ट्र से कोसों दूर जा चुके हैं। पांच हजार वर्ष पुरानी कश्मीरियत पर मात्रा पांच सौ वर्ष पुरानी तहजीब हावी हो गई है। कश्मीर की ध्रती पर उपजे और देश भर में पफैले नागपूजा मत, शैवदर्शन, शेष भारत से कश्मीर आए बौ( मत और वैष्णव मत इत्यादि का नामोनिशान तक मिट चुका है। इनके खंडहर जरूर कहीं-कहीं दिखाई दे जाते हैं। सम्राट ललितादित्य, अवन्ति वर्मन, मेघवाहन, चंद्रापीड, हर्ष आदि का इतिहास तक समाप्त करने के षड्यंत्रा बाकायदा बु(िजीवी स्तर पर किया जा रहा है। आयुर्वेद, गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, ज्योतिष और सांख्य जैसे विश्व प्रसि( दर्शन कश्मीर की ध्रती पर पफले-पफूले हुए। आज ये तमाम दर्शन और विज्ञान भी नई कथित कश्मीरियत का शिकार हो चुके हैं। दुःख की बात तो यह है कि कश्मीर की इस विरासत को अपने बलिदान देकर संभाल कर रखने वाले कश्मीरी पंडित आज कश्मीर से विस्थापित होकर अपने ही भारत देश के कोने-कोने में बेसहारा जिंदगी जीने को मजबूर हैं। भारत से खुद को अलग मानने वाले आज कश्मीर के मालिक बने कह रहे हैं कि उन्हें आजादी चाहिए। इसी उद्देश्य के लिए पाकिस्तान तथा अन्य मुस्लिम देशों से हथियार, पैसा और मुजाहिद्दीन की मदद ली जा रही है। 1947 में हुए भारत विभाजन के समय जम्मू-कश्मीर का भारत में हुआ विधिवत विजय, 1956 में जम्मू-कश्मीर विधनसभा द्वारा इस विलय की पुष्टि, 1992 में भारतीय संसद द्वारा पारित प्रस्ताव ‘पाक अध्किृत कश्मीर समेत सारा जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग’, 1972 में हुआ शिमला-समझौता और कश्मीर में भारत द्वारा खर्च किया जा रहा अरबों का ध्न भी कश्मीर के लोगों को भारत का देशभक्त नागरिक नहीं बनाया जा सका। अलबत्ता भारत की पफौज भी वहां नाकाम साबित हो रही है। वास्तव में कश्मीर में भारत के नाम पर सिपर्फ भारत की पफौज ही है। बाकी सब कुछ वहां की ध्रती पर अगंड़ाई ले चुकी भारत विरोध्ी राजनीति की भेंट चढ़ चुका है। कश्मीर की ध्रती से भारत को लुप्त कर देने वाले पिछले छह सौ वर्षों के इतिहास में जाना इस लेख में संभव नहीं। बस इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि इस कालखंड में चली ध्र्मान्तरण की चक्की ने कश्मीर की भारतीय सूरत को बदलकर रख दिया। वर्तमान कश्मीर में भारत विरोध् का जहर मिला हुआ है और इस भारत विहीन कश्मीर के वर्तमान चेहरे को समझने के लिए 1947 और बाद के कुछ वर्षों के राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर डालना जरूरी है। पाकिस्तान द्वारा कश्मीर को हड़पने के लिए थोपे गए यु( के तुरंत बाद जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को भारत के प्रधनमंत्राी पंडित जवाहर लाल नेहरू के पास पत्रा भेज कर सम्पूर्ण जम्मू-कश्मीर का विलय भारत में कर दिया। इस क्षेत्रा में पाक अध्किृत कश्मीर भी शामिल था। पिफर भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड माउंट बेटन ने इस प्रस्ताव को मंजूरी देकर 27 अक्टूबर 1947 को पूरे जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय अध्किृत कर दिया। पिफर जम्मू-कश्मीर की जनता द्वारा चुनी गई संविधन सभा ने 1954 में प्रदेश के भारत में विलय को मानते हुए अपना एक अलग संविधन बनाया। 17 नवंबर 1956 को प्रदेश की विधनसभा में जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय की पुष्टि कर दी गई। उल्लेखनीय है कि प्रदेश की विधनसभा द्वारा स्वीकृत प्रदेश के संविधन की धरा तीन में स्पष्ट लिखा हुआ है कि - ‘जम्मू-कश्मीर प्रदेश भारत संघ का अभिन्न हिस्सा है और रहेगा।’ इसी संविधन की धरा चार इस प्रकार है - ‘इस प्रदेश की सीमाओं में वह सारा क्षेत्रा रहेगा जो 15 अगस्त 1947 को इस प्रदेश के महाराज के अध्पित्य में था’। स्पष्ट है कि पाक अध्किृत कश्मीर समेत सारा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न संवैधनिक अंग है। जम्मू-कश्मीर के संविधन में इस प्रदेश के भारत में विलय को मान्यता देने वाली धरा चार को भी इसी संविधन की धरा 146 ने सुरक्षात्मक कवच पहना दिया है। इस धरा के अनुसार जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय को निरस्त नहीं किया जा सकता। इस विलय के बाद भारत की सेना कश्मीर पहुंची। भारत के सैनिकों ने पाकिस्तान की कबाइली पफौज को परास्त करना शुरू कर दिया। पाकिस्तान द्वारा जबरदस्ती हड़पा गया कश्मीर का भाग मुक्त होने में थोड़ा ही समय बाकी था कि भारत के तत्कालीन प्रधनमंत्राी पंडित जवाहरलाल नेहरू इस मसले को संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में ले गए। विजयी सैनिकों के पांव में सुरक्षा परिषद के आदेशों की बेड़ियां डाल दी गईं। यु( विराम हो गया। पाकिस्तान के कब्जे वाली जमीन उसी के कब्जे में रह गई। यही आज ‘पाकिस्तान अध्किृत कश्मीर’ कहलाता है। इस कश्मीर को आज तक पाकिस्तान की असेंबली और वहां के सर्वोच्च न्यायालय ने पाकिस्तान का हिस्सा नहीं माना। जाहिर है कि अपने कब्जे वाले कश्मीर को अपना हिस्सा मानने पर भारतीय कश्मीर पर उसका दावा समाप्त हो जाता है। इसीलिए पाकिस्तान यु(विराम रेखा ;अब नियंत्राण रेखाद्ध जैसी किसी सीमा-रेखा को स्वीकार ही नहीं करता। यह एक अलग विषय है कि पाकिस्तान अपने कब्जे वाले कश्मीर में आतंकवादियों के लिए प्रशिक्षण शिविर चला रहा है। यहीं से कश्मीरी आतंकवादी भारतीय कश्मीर में घुसते हैं। पाकिस्तान इन्हीं घुसपैठियों की हर प्रकार से मदद करता है और वर्तमान कश्मीरी अलगाववादी नेताओं के साथ मिलकर प्रायः सभी कट्टरपंथी राजनीतिक दल कश्मीर को भारत से अलग स्वतंत्रा राष्ट्र बनाने के प्रयासों में जुटे हैं। इस तरह से कश्मीर में से भारत को गायब करने के षड्यंत्रा रचे जा रहे हैं। दुर्भाग्य और आश्चर्य की बात यह है कि कश्मीर में पनप चुके इस भारत-विरोध्ी जनून को भारत के ही संविधन में जोड़े गए अनुच्छेद 370 ने न केवल आश्रय ही दिया है अपितु उसे सुरक्षित, धरदार और स्थाई भी बनाया है। इसी अनुच्छेद ने भारतीयों को कश्मीर में विदेशी जैसा करार दिया है। जम्मू-कश्मीर को विशेष और भिन्न पंक्ति में खड़ा करने वाला भारतीय संविधन का यह अनुच्छेद ही वास्तव में हमारी इस घोषणा का मजाक उड़ाता है कि ‘कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है।’ यह ‘भिन्नता’ और ‘विशेषता’ ही इस प्रदेश को शेष देश से अलग कर देती है। इस अनुच्छेद 370 को संविधन द्वारा मान्यता प्राप्त अलगाववाद कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसी अनुच्छेद के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर का अपना अलग से संविधन है। भारत का संविधान, संसद, सर्वोच्च न्यायालय, चुनाव आयोग और वित्तीय आयोग प्रदेश के संविधन के आगे बौने साबित होते हैं। भारत के किसी भी कानून को लागू करने के लिए प्रदेश की विधानसभा की इजाजत लेनी पड़ती है। भारत के राष्ट्रपति भी जम्मू-कश्मीर संविधान के समक्ष हाथ खड़े कर देते हैं। जम्मू-कश्मीर का अपना एक अलग ध्वज, हल वाला लाल झंडा, है। यहां के सचिवालय, सरकारी भवनों, मंत्रियों के दफ्रतरों, घरों और गाड़ियों पर दो झंडे लाल झंडा और तिरंगा झंडा होते हैं। भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को प्रदेश के हल वाले लाल झंडे से एक-दो पफुट नीचे रहना पड़ता है। यहां की विधानसभा का कार्यकाल छह वर्ष का होता है। भारतीय संविधन की समवर्ती और संघीय सूची के सभी विषयों पर कानूनों की निर्माण-प्रक्रिया में प्रदेश की सरकार को अड़ंगा डालने और मनमानी करने का संवैधनिक अध्किार प्राप्त है। भारत के राष्ट्रपति भारतीय संविधन के अनुच्छेद 356 के तहत जम्मू-कश्मीर में कुछ नहीं कर सकते। राष्ट्रीय आपात स्थिति घोषित करने वाला अनुच्छेद 352 भी जम्मू-कश्मीर में नाकाम साबित हो चुका है। इसी प्रकार वित्तीय आपात स्थिति लागू करने वाला अनुच्छेद 360 तो यहां लागू ही नहीं हो सकता। भारतीय संविधन में समस्त देशवासियों के लिए एक ही नागरिकता की व्यवस्था है। परन्तु जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को प्रदेश की ;स्टेट सब्जैक्टद्ध और भारत की, इस तरह दोहरी नागरिकता प्राप्त है। जम्मू-कश्मीर का नागरिक भारत का नागरिक हो सकता है। परंतु कोई भी भारतीय जम्मू-कश्मीर का नागरिक नहीं हो सकता। भारत के नागरिक को जम्मू-कश्मीर में सम्पत्ति खरीदने, वोट देने और सरकारी नौकरी करने का हक प्राप्त नहीं है। अनुच्छेद 370 भी आड़ लेकर कश्मीर घाटी के कट्टरपंथी मुस्लिम नेता सदैव ही भारतीय सरकार द्वारा संचालित राष्ट्रीय महत्व के प्रकल्पों और कार्यक्रमों का मजहबी आधर पर विरोध् करते रहते हैं। वर्तमान में अमरनाथ-यात्रा पर उठा बवाल भी इसी कट्टरपंथी भारत विरोध्ी जनून का हिस्सा है। इसी अनुच्छेद से संरक्षण और संवैधनिक मान्यता प्राप्त कर कश्मीर की ध्रती पर अराष्ट्रीय तत्व सिर उठाकर खड़े हो गए हैं। कश्मीर के लोगों को राष्ट्रीय धरा में शामिल होने की प्रेरणा देने के बजाए भारत की सरकार ने अन्य प्रदेशांे की तुलना में उन्हें अत्यध्कि और असीमित अध्किार देकर सिर पर चढ़ा लिया है। इसी अनुच्छेद की वजह से कश्मीरी जनता के जेहन में भारत में विलय को लेकर शंका पैदा हुई और चार लाख कश्मीरी पंडितों को अपने घर, सम्पत्ति, बाग-बगीचे, देव-देवालय छोड़कर भागना पड़ा। भारतीय संविधन के निर्माता डाॅ. भीमराव आंबेडकर ने तत्कालीन प्रधनमंत्राी पं. जवाहरलाल को चेतावनी देेते हुए कहा था कि ‘इस अनुच्छेद 370 से जम्मू-कश्मीर राज्य को भारत के साथ समरस करने में दिक्कतें खड़ी होंगी। यह अनुच्छेद 370 कश्मीर घाटी के लोगों में अलगाववाद के बीज बोएगा। परंतु किसी अजीब और अपरिपक्व राजनीतिक मानसिकता ने सभी के दिमागों पर मानो कब्जा जमा लिया और अनुच्छेद 370 आज तक बरकरार है। परिणाम सबके सामने है। आज कश्मीर में हिसंक अलगाववाद अपनी चरम सीमा पर है। केवल पाकिस्तानपरस्त हुर्रियत कान्Úेंस ही नहीं, बल्कि नेशनल कांÚेंस, पीडीपी और ज्यादातर कांग्रेसी नेताओं ने भी कश्मीरी राष्ट्रवाद का नारा बुलंद कर रखा है। ये नेता कश्मीर में शेष भारत के सौ करोड़ नागरिकों को एक-दो एकड़ जमीन भी देने को तैयार नहीं हैं, पिफर अमरनाथ श्राइन बोर्ड को सौ एकड़ जमीन कहां से मिल पाती? केंद्र और प्रदेश की सरकारों को भी इन अलगाववादी तत्वों के आगे घुटने टेकने पड़ गए। यहीं यह शंका होती है कि क्या कश्मीर भारत का हिस्सा है? आज कश्मीर में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लग रहे हैं। वहां पाकिस्तान के झंडे पफहराते हैं। भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे जलाए जाते हैं। ‘भारतीय कुत्तों ;सैनिकोंद्ध वापस जाओ’ के नारे भी लगते हैं। भारत के लोग वहां सुरक्षित नहीं हैं। श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड की जमीन सरकार द्वारा वापस लिए जाने पर विजय दिवस मनाए जाता हैं। यह विजय दिवस किसकी विजय है? आज कश्मीर के प्रायः सभी राजनीतिक दल व पाकपरस्त संस्थाएं एक मंच पर आ गए हैं। भारत-विरोध् का यह बवंडर बड़े ही योजनाब( ढंग से खड़ा किया जा रहा है। जाहिर है कि कश्मीर का भारत में विलय और कश्मीर भारत का अविभाज्य भाग जैसी घोषणाएं केवल कागजी घोड़े हैं। भविष्य के इतिहासकार को कश्मीर में भारत को कहीं गहरे जाकर खोजना पड़ेगा।

शुक्रवार, 8 अगस्त 2008

तीसरा मोर्चा : भ्रान्ति की पठकथा

विश्वास मत के दौरान कांग्रेस सरकार बचाने में लगी थी और विपक्षी दल भाजपा और वाममोर्चा मिलकर सरकार गिराने पर आमादा थे। अपने-अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए इन दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों ने संसद की और अपनी गरिमा के साथ जो खिलवाड़ किया वह सबके सामने आ ही चुका है और चर्चा का विषय भी बना हुआ है। जब राष्ट्रीय पार्टियों की दुर्गति का आलम यह हो तो पिफर ‘भानमती का कुनबा’ या ‘चूं-चूं का मुरब्बा’ कहे जाने वाले तीसरे मोर्चे की बिसात ही क्या है? तीसरे मोर्चे के इतिहास को देखते हुए उससे यह उम्मीद वैसे भी नहीं लगाई जानी चाहिए कि वह संसद को कोई सार्थक दिशा दे पाएगा। क्यों? इसलिए कि तीसरे मोर्चा जब खुद की ही दिशा आज तक तय नहीं कर पाया तो संसद को दिशा देने का प्रश्न ही नहीं उठता। बार-बार बनकर बिखर जाने वाले इस से मोर्चे से कोई उम्मीद भला कैसे लगाई जा सकती है। तीसरे मोर्चे ने पहली बार नेशनल Úंट ;1989-1991द्ध के रूप में भारतीय राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई पर यह गठजोड़ ज्यादा दिन स्थायी नहीं रह पाया और बिखर गया। 1996 के आम चुनावांे मे जनता ने किसी पार्टी को बहुमत नहीं दिया, भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप मे उभरी, लेकिन भाजपा की सरकार महज दो हफ्रतों में गिर गई। कांग्रेस जो उस समय दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी, उसने सरकार बनाने की बजाए किसी और पार्टी को समर्थन देना उचित समझा। इसी से ‘यूनाइटेड Úंट’ ;1996-1998द्ध का उदय हुआ, जो तीसरे मोर्चे का दूसरा प्रयोग था। कांग्रेस और वाम मोर्चे के समर्थन से ‘यूनाइटेड Úंट’ की सरकार बनी। जुगाड़ की दम पर बने तीसरे मोर्चे का यह प्रयोग भी ज्यादा दिन नहीं चला। प्रधनमंत्राी एचडी देवगौड़ा को पद छोड़ना पड़ा। इस तरह देखा जाए तो जुगाड़ की दम पर बनने वाला तीसरा मोर्चा देश को चार प्रधनमंत्राी दे चुका है पर कोई भी प्रधनमंत्राी ज्यादा दिनांे तक टिक नहीं पाया। केंद्रीय सत्ता में आने के बावजूद तीसरा मोर्चा अपनी कोई अहमियत भारतीय राजनीति में दर्ज नहीं करा पाया है। इनका पूरा कार्यकाल सहयोगी दलांे को सहेजने और उनकी मांगों को पूरा करने में ही लगा रहा। राजनेताओं की मानें तो तीसरे मोर्चे का मुख्य उद्देश्य कांग्रेस और भाजपा से समान दूरी बना कर अपने आप को मजबूत करने का था। पर यह उद्देश्य कभी पूरा नहीं हुआ। अब तक इस मोर्चे के लगभग सभी घटक दल केंद्र में किसी न किसी गठबंध्न के साथ सत्ता सुख भोग चुके हैं। विचारधरा और उद्देश्यों की समानता का नाम लेकर समर्थन करने वाले ये घटक कभी राजग के साथ खड़े हो जाते हैं तो कभी संप्रग के साथ। गठबंध्न की राजनीति में इन दलों की विचारधरा के साथ इतना घालमेल हो चुका है कि आज इन दलों के कार्यकर्ता अपने दल की मूल विचारधरा ही नहीं खोज पा रहे हैं। तीसरे मोर्चे के व्यवहार को देख कर लगता है कि किसी मौके के अभाव में तीसरा मोर्चा कुछ हद तक संगठित रहता है पर जैसे ही कोई मौका आता है, जब तीसरा मोर्चा अपनी तटस्थता दिखा सकता है, मोर्चे में शामिल होने वाले सभी दल अपनी-अपनी संख्या और हैसियत के हिसाब से मोलभाव शुरू कर देते हंै और तीसरा मोर्चा पिफर किसी गुमनाम से चैराहे पर अपने मुद्दों को भुलाकर भ्रमित स्थिति में खड़ा रह जाता है । यही कारण है कि भारतीय राजनीति के दो ध््रुव कांग्रेस और भाजपा से अलग कोई तीसरा सशक्त मोर्चा अब तक खड़ा नहीं हो पाया। मोर्चे में हालिया बिखराव मनमोहन सिंह सरकार के विश्वास मत के दौरान बखूबी देखने को मिला। समाजवादी पार्टी जो तीसरे मोर्चे की जबरदस्त पैरोकार रही है, और उसी की पहल पर ही यूएनपीए खड़ा हुआ, जिसमें वे सभी पाटियों शामिल हुईं हैं जो न तो राजग मंे थीं और न ही संप्रग में। इस मोर्चे का अगुवाकार रही समाजवादी पार्टी अपने ही खड़े किए हुए यूएनपीए को छोड़ कर अलग हो गई और विश्वासमत के समय संप्रग के पक्ष में वोट दिया। इसी तरह कई अन्य दल भी अंत तक सौदेबाजी में पफंसे रहे और जब सौदा नहीं पटा तब तीसरे मोर्चे के साथ खड़े हो गए। इस बार भी जुगाड़ ने मुख्य भूमिका निभाई। यह शायद जुगाड़ ही था जो वामदलों को सपा की बजाए बसपा के पास ले आया। तीसरे मोर्चे का वैचारिक पैरोकार रहा वामदल हमेशा से तीसरे मोर्चे को मजबूत करने की वकालत करता है, पर ऐसा कर नहीं पाता है। अब वाममोर्चा बसपा सुप्रीमो मायावती में संभावनाएं तलाश रहा है। उसने विश्वास मत की सौदेबाजी में मायावती को प्रधनमंत्राी पद का दावेदार तक बना दिया, और मायावती भी अपने चिर-परिचित अंदाज को बदल कर अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर अपने ज्ञान की झलक दिखाने में जुट गईं। परंतु सिपर्फ ईरान गैस पाइपलाइन का मसला उठा देने से या परमाणु करार को मुस्लिम विरोध्ी घोषित कर देने से मायावती अंतर्राष्ट्रीय मामलों की विशेषज्ञ नहीं मानी जा सकती। मायावती कभी तीसरे मोर्चे का हिस्सा नहीं रहीं, परंतु विश्वासमत के दौरान जब संसद और देश विश्वसनीयता के मानदंडों से जूझ रहे थे उस समय मायावती अचानक तीसरे मोर्चे में जा कूदीं और तीसरे मोर्चे ने भी उन्हें अचानक अपने नेता के रूप में लपक लिया। अपनी अविश्वसनीयता और हल्केपन को साबित करने के लिए इससे बड़ी कोई दूसरी कसौटी हो सकती है? संसद की गरिमा में संेध् लगाने का काम तीसरे मोर्चे के नेताओं ने इस विश्वास मत के दौरान इतनी आसानी से कर लिया, इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर दो नेता उभरे, वे हैं एचडी देवेगौड़ा और अजित सिंह। मायावती के व्यक्तित्व में भावी प्रधनमंत्राी के गुणों को बखानते हुए ये दोनों नेता अपने दल-बल के साथ जितनी तेजी से तीसरे मोर्चे का हिस्सा बनने को आतुर दिखे और सरकार के खिलापफ वोट देने जैसी घोषणा करने लगे, उसी तेजी के साथ वे ये कहते हुए वापस भी लौटते हुए नजर आए कि वोट के बारे में पफैसला वे मतदान से कुछ समय पूर्व ही ले पाएंगे। तीसरे मोर्चे की नीयती ही एक पार्किंग लाट बनना रह गया है जब किसी पार्टी को कहीं जगह नहीं मिलती है तो वह यहां पर अपनी गाड़ी खड़ी कर देता है और नई संभावना जब दिखाई देती है तब अपनी गाड़ी के साथ चलता बनता है। पार्किंग की जगह पर गाड़ियां आती हैं और चली जाती हैं। वहां समाज का प्रतिबिंब बन सकने वाली इमारतें खड़ी नहीं की जा सकतीं।