गुरुवार, 21 अगस्त 2008

कश्मीर में कहीं ‘भारत’ दिखाई नही देता

कश्मीर में कहीं ‘भारत’ दिखाई नही देता
नरेन्द्र सहगल
भारत की सरकार, राजनीतिक नेता, धर्मिक/सामाजिक रहनुमा और भारत के लोग भले ही कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग कहते न थकते हों, परंतु जमीनी सच्चाई यह है कि आज का कश्मीर, कश्मीरी और कश्मीरियत भारत, भारतीयों और भारत राष्ट्र से कोसों दूर जा चुके हैं। पांच हजार वर्ष पुरानी कश्मीरियत पर मात्रा पांच सौ वर्ष पुरानी तहजीब हावी हो गई है। कश्मीर की ध्रती पर उपजे और देश भर में पफैले नागपूजा मत, शैवदर्शन, शेष भारत से कश्मीर आए बौ( मत और वैष्णव मत इत्यादि का नामोनिशान तक मिट चुका है। इनके खंडहर जरूर कहीं-कहीं दिखाई दे जाते हैं। सम्राट ललितादित्य, अवन्ति वर्मन, मेघवाहन, चंद्रापीड, हर्ष आदि का इतिहास तक समाप्त करने के षड्यंत्रा बाकायदा बु(िजीवी स्तर पर किया जा रहा है। आयुर्वेद, गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, ज्योतिष और सांख्य जैसे विश्व प्रसि( दर्शन कश्मीर की ध्रती पर पफले-पफूले हुए। आज ये तमाम दर्शन और विज्ञान भी नई कथित कश्मीरियत का शिकार हो चुके हैं। दुःख की बात तो यह है कि कश्मीर की इस विरासत को अपने बलिदान देकर संभाल कर रखने वाले कश्मीरी पंडित आज कश्मीर से विस्थापित होकर अपने ही भारत देश के कोने-कोने में बेसहारा जिंदगी जीने को मजबूर हैं। भारत से खुद को अलग मानने वाले आज कश्मीर के मालिक बने कह रहे हैं कि उन्हें आजादी चाहिए। इसी उद्देश्य के लिए पाकिस्तान तथा अन्य मुस्लिम देशों से हथियार, पैसा और मुजाहिद्दीन की मदद ली जा रही है। 1947 में हुए भारत विभाजन के समय जम्मू-कश्मीर का भारत में हुआ विधिवत विजय, 1956 में जम्मू-कश्मीर विधनसभा द्वारा इस विलय की पुष्टि, 1992 में भारतीय संसद द्वारा पारित प्रस्ताव ‘पाक अध्किृत कश्मीर समेत सारा जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग’, 1972 में हुआ शिमला-समझौता और कश्मीर में भारत द्वारा खर्च किया जा रहा अरबों का ध्न भी कश्मीर के लोगों को भारत का देशभक्त नागरिक नहीं बनाया जा सका। अलबत्ता भारत की पफौज भी वहां नाकाम साबित हो रही है। वास्तव में कश्मीर में भारत के नाम पर सिपर्फ भारत की पफौज ही है। बाकी सब कुछ वहां की ध्रती पर अगंड़ाई ले चुकी भारत विरोध्ी राजनीति की भेंट चढ़ चुका है। कश्मीर की ध्रती से भारत को लुप्त कर देने वाले पिछले छह सौ वर्षों के इतिहास में जाना इस लेख में संभव नहीं। बस इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि इस कालखंड में चली ध्र्मान्तरण की चक्की ने कश्मीर की भारतीय सूरत को बदलकर रख दिया। वर्तमान कश्मीर में भारत विरोध् का जहर मिला हुआ है और इस भारत विहीन कश्मीर के वर्तमान चेहरे को समझने के लिए 1947 और बाद के कुछ वर्षों के राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर डालना जरूरी है। पाकिस्तान द्वारा कश्मीर को हड़पने के लिए थोपे गए यु( के तुरंत बाद जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को भारत के प्रधनमंत्राी पंडित जवाहर लाल नेहरू के पास पत्रा भेज कर सम्पूर्ण जम्मू-कश्मीर का विलय भारत में कर दिया। इस क्षेत्रा में पाक अध्किृत कश्मीर भी शामिल था। पिफर भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड माउंट बेटन ने इस प्रस्ताव को मंजूरी देकर 27 अक्टूबर 1947 को पूरे जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय अध्किृत कर दिया। पिफर जम्मू-कश्मीर की जनता द्वारा चुनी गई संविधन सभा ने 1954 में प्रदेश के भारत में विलय को मानते हुए अपना एक अलग संविधन बनाया। 17 नवंबर 1956 को प्रदेश की विधनसभा में जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय की पुष्टि कर दी गई। उल्लेखनीय है कि प्रदेश की विधनसभा द्वारा स्वीकृत प्रदेश के संविधन की धरा तीन में स्पष्ट लिखा हुआ है कि - ‘जम्मू-कश्मीर प्रदेश भारत संघ का अभिन्न हिस्सा है और रहेगा।’ इसी संविधन की धरा चार इस प्रकार है - ‘इस प्रदेश की सीमाओं में वह सारा क्षेत्रा रहेगा जो 15 अगस्त 1947 को इस प्रदेश के महाराज के अध्पित्य में था’। स्पष्ट है कि पाक अध्किृत कश्मीर समेत सारा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न संवैधनिक अंग है। जम्मू-कश्मीर के संविधन में इस प्रदेश के भारत में विलय को मान्यता देने वाली धरा चार को भी इसी संविधन की धरा 146 ने सुरक्षात्मक कवच पहना दिया है। इस धरा के अनुसार जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय को निरस्त नहीं किया जा सकता। इस विलय के बाद भारत की सेना कश्मीर पहुंची। भारत के सैनिकों ने पाकिस्तान की कबाइली पफौज को परास्त करना शुरू कर दिया। पाकिस्तान द्वारा जबरदस्ती हड़पा गया कश्मीर का भाग मुक्त होने में थोड़ा ही समय बाकी था कि भारत के तत्कालीन प्रधनमंत्राी पंडित जवाहरलाल नेहरू इस मसले को संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में ले गए। विजयी सैनिकों के पांव में सुरक्षा परिषद के आदेशों की बेड़ियां डाल दी गईं। यु( विराम हो गया। पाकिस्तान के कब्जे वाली जमीन उसी के कब्जे में रह गई। यही आज ‘पाकिस्तान अध्किृत कश्मीर’ कहलाता है। इस कश्मीर को आज तक पाकिस्तान की असेंबली और वहां के सर्वोच्च न्यायालय ने पाकिस्तान का हिस्सा नहीं माना। जाहिर है कि अपने कब्जे वाले कश्मीर को अपना हिस्सा मानने पर भारतीय कश्मीर पर उसका दावा समाप्त हो जाता है। इसीलिए पाकिस्तान यु(विराम रेखा ;अब नियंत्राण रेखाद्ध जैसी किसी सीमा-रेखा को स्वीकार ही नहीं करता। यह एक अलग विषय है कि पाकिस्तान अपने कब्जे वाले कश्मीर में आतंकवादियों के लिए प्रशिक्षण शिविर चला रहा है। यहीं से कश्मीरी आतंकवादी भारतीय कश्मीर में घुसते हैं। पाकिस्तान इन्हीं घुसपैठियों की हर प्रकार से मदद करता है और वर्तमान कश्मीरी अलगाववादी नेताओं के साथ मिलकर प्रायः सभी कट्टरपंथी राजनीतिक दल कश्मीर को भारत से अलग स्वतंत्रा राष्ट्र बनाने के प्रयासों में जुटे हैं। इस तरह से कश्मीर में से भारत को गायब करने के षड्यंत्रा रचे जा रहे हैं। दुर्भाग्य और आश्चर्य की बात यह है कि कश्मीर में पनप चुके इस भारत-विरोध्ी जनून को भारत के ही संविधन में जोड़े गए अनुच्छेद 370 ने न केवल आश्रय ही दिया है अपितु उसे सुरक्षित, धरदार और स्थाई भी बनाया है। इसी अनुच्छेद ने भारतीयों को कश्मीर में विदेशी जैसा करार दिया है। जम्मू-कश्मीर को विशेष और भिन्न पंक्ति में खड़ा करने वाला भारतीय संविधन का यह अनुच्छेद ही वास्तव में हमारी इस घोषणा का मजाक उड़ाता है कि ‘कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है।’ यह ‘भिन्नता’ और ‘विशेषता’ ही इस प्रदेश को शेष देश से अलग कर देती है। इस अनुच्छेद 370 को संविधन द्वारा मान्यता प्राप्त अलगाववाद कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसी अनुच्छेद के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर का अपना अलग से संविधन है। भारत का संविधान, संसद, सर्वोच्च न्यायालय, चुनाव आयोग और वित्तीय आयोग प्रदेश के संविधन के आगे बौने साबित होते हैं। भारत के किसी भी कानून को लागू करने के लिए प्रदेश की विधानसभा की इजाजत लेनी पड़ती है। भारत के राष्ट्रपति भी जम्मू-कश्मीर संविधान के समक्ष हाथ खड़े कर देते हैं। जम्मू-कश्मीर का अपना एक अलग ध्वज, हल वाला लाल झंडा, है। यहां के सचिवालय, सरकारी भवनों, मंत्रियों के दफ्रतरों, घरों और गाड़ियों पर दो झंडे लाल झंडा और तिरंगा झंडा होते हैं। भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को प्रदेश के हल वाले लाल झंडे से एक-दो पफुट नीचे रहना पड़ता है। यहां की विधानसभा का कार्यकाल छह वर्ष का होता है। भारतीय संविधन की समवर्ती और संघीय सूची के सभी विषयों पर कानूनों की निर्माण-प्रक्रिया में प्रदेश की सरकार को अड़ंगा डालने और मनमानी करने का संवैधनिक अध्किार प्राप्त है। भारत के राष्ट्रपति भारतीय संविधन के अनुच्छेद 356 के तहत जम्मू-कश्मीर में कुछ नहीं कर सकते। राष्ट्रीय आपात स्थिति घोषित करने वाला अनुच्छेद 352 भी जम्मू-कश्मीर में नाकाम साबित हो चुका है। इसी प्रकार वित्तीय आपात स्थिति लागू करने वाला अनुच्छेद 360 तो यहां लागू ही नहीं हो सकता। भारतीय संविधन में समस्त देशवासियों के लिए एक ही नागरिकता की व्यवस्था है। परन्तु जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को प्रदेश की ;स्टेट सब्जैक्टद्ध और भारत की, इस तरह दोहरी नागरिकता प्राप्त है। जम्मू-कश्मीर का नागरिक भारत का नागरिक हो सकता है। परंतु कोई भी भारतीय जम्मू-कश्मीर का नागरिक नहीं हो सकता। भारत के नागरिक को जम्मू-कश्मीर में सम्पत्ति खरीदने, वोट देने और सरकारी नौकरी करने का हक प्राप्त नहीं है। अनुच्छेद 370 भी आड़ लेकर कश्मीर घाटी के कट्टरपंथी मुस्लिम नेता सदैव ही भारतीय सरकार द्वारा संचालित राष्ट्रीय महत्व के प्रकल्पों और कार्यक्रमों का मजहबी आधर पर विरोध् करते रहते हैं। वर्तमान में अमरनाथ-यात्रा पर उठा बवाल भी इसी कट्टरपंथी भारत विरोध्ी जनून का हिस्सा है। इसी अनुच्छेद से संरक्षण और संवैधनिक मान्यता प्राप्त कर कश्मीर की ध्रती पर अराष्ट्रीय तत्व सिर उठाकर खड़े हो गए हैं। कश्मीर के लोगों को राष्ट्रीय धरा में शामिल होने की प्रेरणा देने के बजाए भारत की सरकार ने अन्य प्रदेशांे की तुलना में उन्हें अत्यध्कि और असीमित अध्किार देकर सिर पर चढ़ा लिया है। इसी अनुच्छेद की वजह से कश्मीरी जनता के जेहन में भारत में विलय को लेकर शंका पैदा हुई और चार लाख कश्मीरी पंडितों को अपने घर, सम्पत्ति, बाग-बगीचे, देव-देवालय छोड़कर भागना पड़ा। भारतीय संविधन के निर्माता डाॅ. भीमराव आंबेडकर ने तत्कालीन प्रधनमंत्राी पं. जवाहरलाल को चेतावनी देेते हुए कहा था कि ‘इस अनुच्छेद 370 से जम्मू-कश्मीर राज्य को भारत के साथ समरस करने में दिक्कतें खड़ी होंगी। यह अनुच्छेद 370 कश्मीर घाटी के लोगों में अलगाववाद के बीज बोएगा। परंतु किसी अजीब और अपरिपक्व राजनीतिक मानसिकता ने सभी के दिमागों पर मानो कब्जा जमा लिया और अनुच्छेद 370 आज तक बरकरार है। परिणाम सबके सामने है। आज कश्मीर में हिसंक अलगाववाद अपनी चरम सीमा पर है। केवल पाकिस्तानपरस्त हुर्रियत कान्Úेंस ही नहीं, बल्कि नेशनल कांÚेंस, पीडीपी और ज्यादातर कांग्रेसी नेताओं ने भी कश्मीरी राष्ट्रवाद का नारा बुलंद कर रखा है। ये नेता कश्मीर में शेष भारत के सौ करोड़ नागरिकों को एक-दो एकड़ जमीन भी देने को तैयार नहीं हैं, पिफर अमरनाथ श्राइन बोर्ड को सौ एकड़ जमीन कहां से मिल पाती? केंद्र और प्रदेश की सरकारों को भी इन अलगाववादी तत्वों के आगे घुटने टेकने पड़ गए। यहीं यह शंका होती है कि क्या कश्मीर भारत का हिस्सा है? आज कश्मीर में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लग रहे हैं। वहां पाकिस्तान के झंडे पफहराते हैं। भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे जलाए जाते हैं। ‘भारतीय कुत्तों ;सैनिकोंद्ध वापस जाओ’ के नारे भी लगते हैं। भारत के लोग वहां सुरक्षित नहीं हैं। श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड की जमीन सरकार द्वारा वापस लिए जाने पर विजय दिवस मनाए जाता हैं। यह विजय दिवस किसकी विजय है? आज कश्मीर के प्रायः सभी राजनीतिक दल व पाकपरस्त संस्थाएं एक मंच पर आ गए हैं। भारत-विरोध् का यह बवंडर बड़े ही योजनाब( ढंग से खड़ा किया जा रहा है। जाहिर है कि कश्मीर का भारत में विलय और कश्मीर भारत का अविभाज्य भाग जैसी घोषणाएं केवल कागजी घोड़े हैं। भविष्य के इतिहासकार को कश्मीर में भारत को कहीं गहरे जाकर खोजना पड़ेगा।

कोई टिप्पणी नहीं: