गुरुवार, 21 अगस्त 2008

बनिहाल टनल के उस पार है इंडिया


बनिहाल टनल के उस पार है इंडिया

बिशन कुमार

नगर की अलस्सुबह। दिन की गहमा-गहमी अभी शुरू नहीं हुई है। लाल चैक में टाटा सूमो पर जम्मू जाने वाली सवारियां चढ़ रही हैं। एक लड़का ते”ा आवा”ा लगा रहा है - जम्मू, जम्मू। अब्दुल वाहिद अटैची लेकर दौड़ता है और सूमो की अगली सीट पर जम जाता है। एक दोस्त उसे देख दुआ सलाम कर पूछता है, कहां जा रहे हो। वाहिद अपनी ”ाुबान कश्मीरी में जवाब देता है - इंडिया। यह किसी पिफल्म की अति नाटकीय स्क्रिप्ट नहीं है। यह एक ऐसा सच है जो लाल चैक से लेकर बटमालू बस अड्डे तक रो”ा घटता है। आम कश्मीरी के ‘देश’ की सरहद बनिहाल टनल के इस तरपफ खत्म हो जाती है और टनल के उस तरपफ है इंडिया। यह पफासला भौगोलिक नहीं बल्कि मानसिक है। इंडिया और कश्मीर के बीच का प़फासला आ”ाादी के 61 वर्षों बाद भी कम नहीं हुआ - बल्कि और गहरा हुआ है। कश्मीरियों के लिए आज भी ‘इंडिया’ एक ऐसी शय है जिसके साथ रहना उनकी मजबूरी है। इस मजबूरी का खूब प़फायदा उठाया पाकिस्तान ने और दिल्ली में बैठे हुक्मरानों और कश्मीर में थोपी गई पिट्ठू सरकारों ने दिशाहीन नीतियों के चलते कश्मीर और इंडिया के बीच न तो ”ामीनी दूरी कम करने की कोई सार्थक पहल की और न ही जेहानी। हालात इतने बदतर होते गए कि जो भी इंडिया के करीब दिखा, वह कश्मीरियों का दुश्मन बन गया - चाहे वह टनल के उस पार रहने वाले हिंदू हों या लद्दाखी बौ(। जम्मू और लद्दाख के बाशिंदे तो अपने लिए कश्मीर से अलग क्षेत्राीय स्वायत्तता की मांग करते आ रहे हैं। उन्हें कतई विश्वास नहीं कश्मीरी नेताओं पर। वे मानते हैं कि घाटी में बसे कश्मीरी मुस्लिम कभी भी उनके हित की बात नहीं सोच सकते। लगभग डेढ़ दशक पहले कश्मीरियों और बौ(ों के बीच टकराव इस कदर बढ़ गया था कि दोनों ने एक दूसरे का सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार कर दिया था - न तो बौ( कश्मीरियों की टैक्सी में बैठते थे और न ही कश्मीरी बौ(ों की दुकानों से सामान खरीदते। खूनी टकराव तक हुए। यह प़फासला अभी तक बरकरार है, हालांकि अब बहिष्कार की नौबत नहीं है। लगभग यही हाल कश्मीरियों और कारगिलियों के बीच है। कारगिल में लगभग सभी शिया मुसलमान हैं, जबकि कश्मीर में सुन्नी। दोनों के आपसी रिश्ते कभी सहज नहीं रहे। दोनों ही एक-दूसरे के बारे में अच्छी राय नहीं रखते। कारगिली शिया मौका मिलते ही कश्मीरियों की बुराई करने लगेगा, वहीं कश्मीरी मुसलमान कारगिली शियाओं के बारे में अनाप-शनाप बोलने लगेगा। शायद यही कारण है कि 1990 से कश्मीर से शुरू हुए तथाकथित ‘”ोहाद’ में कारगिलियों ने कोई हिस्सा नहीं लिया। शायद ही ऐसा मामला सामने आया हो कि जब कोई कारगिली शिया सरहद पार जाकर आतंकवाद का प्रशिक्षण लेने गया हो। ऊंची पहाड़ियों पर बैठे पाकिस्तानी सैनिक भी कुछ बरस पहले तक कारगिल शहर पर लगातार बम गिराते रहते थे। कश्मीर की आ”ाादी की लड़ाई में शामिल न होने की स”ाा मिलती थी शिया मुसलमानों को। जम्मू-कश्मीर के सक्रिय आतंकवादी संगठन भी कश्मीर में बनिहाल टनल के इस पार और उस पार रहने वाले मुसलमानों के बीच प़फर्क करते हैं। कश्मीर में बम पफटने और गोलीबारी की घटनाओं में निर्दोष कश्मीरी भी मारे जाते हैं पर उनका निशाना भारतीय सेना ही होती है। बनिहाल टनल के उस पार पड़ने वाले गांवों-कस्बों में आतंकवादी घटनाओं में जो लोग मरते हैं वे कश्मीरी ”ाुबान नहीं बोलते -चाहे हिंदू हों या मुसलमान। आतंकवादियों की किसी भी तं”ाीम ने हिंदी बोलने वाले मुसलमानों के मरने पर कभी अप़फसोस नहीं जताया। आखिर आम कश्मीरी अपने आपको हिंदुस्तान या भारत का हिस्सा क्यों नहीं मानता? श्रीनगर में इंडियन एक्सपे्रस के ब्यूरो प्रमुख मुजम्मिल जलील का मानना है कि इस मानसिकता को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। इस मानसिकता का बीज 1990 में नहीं पड़ा था, बल्कि सैंकड़ों वर्षों से कश्मीर विदेशी लोगों के आक्रमण और ”यादतियों का शिकार होता रहा। कश्मीरियों से हमेशा दोयम दर्जे के काम कराए जाते थे और प्रशासन के ऊंचे पदों पर उनका कोई हाथ नहीं रहा था। 1947 के बाद भी कश्मीर में कश्मीरी मुसलमानों को कश्मीरी पंडितों की सरमायेदारी में रहना पड़ा। कारण यह है कि मुसलमान मुख्यतः अशिक्षित थे और कश्मीरी पंडित पढ़े-लिखे होने के कारण स्कूल में शिक्षक के पद से लेकर सचिवालय में बाबू से साहब के पदों पर बैठे थे। अपनी ही ”ामीन पर दोयम दर्जे के नागरिक के तौर पर रहने का दुख उन्हें सदियों से सालता रहा था, जिसका विस्पफोट 1989-90 में आतंकवाद के रूप में हुआ। उनका गुस्सा उस दौरान लगाए जाने वाले नारों से सापफ समझ में आता है। ‘कश्मीर में रहना है तो अल्ला हो अकबर कहना होगा’ से लेकर ‘अशि गछि पाकिस्तान, बटो बगर बटनेऊ सान’ ;हमें चाहिए पाकिस्तान, कश्मीरी पंडितों के बगैर, कश्मीरी औरतों के साथद्ध, तक के सप़फर ने बेहद जहरीला वातावरण बना दिया था। कश्मीर मामलों के जानकार मानते हैं कि 1951 से लेकर 1998 तक कश्मीर में हर विधनसभा चुनावों में खुलकर धंध्ली हुई और दिल्ली की पिट्ठू सरकारें गद्दी पर बिठाई गईं। केवल 1977 के चुनाव को लोग कुछ हद तक सापफ-सुथरा मानते हैं। अलगाववादी नेता अब्दुल गनी लोन का कहना था कि कश्मीर की कहानी, वायदा खिलापफी की कहानी है। 1987 में एक ऐसा मौका भारत सरकार के सामने आया था जब कश्मीर की आ”ाादी मांगने वाले नेता मुस्लिम यूनाईटेड Úंट बनाकर चुनाव मैदान में उतरे थे। यानी सैÕयद सलाहुद्दीन, हिजबुल मुजाहिद्दीन का सुप्रीम कंमाडर पीर मोहम्मद युसुपफ शाह भी अमरा कदल क्षेत्रा से चुनाव मैदान में थे और बाकी उम्मीदवार भी उसके साथी थे। मतदान से पहले ही Úंट के सभी उम्मीदवारों और समर्थकों को जेल में ठूंस दिया गया। ”ााहिर है, दिल्ली नहीं चाहती थी कि ये नेता जीतें और सत्ता में भागीदारी करें। ये सभी नेता हार गए। इसी जेल में ही योजना बनी और पांच लोग जेल से छूटने के बाद सीध्े पाकिस्तान गए और हथियार और आ”ाादी का नारा लेकर लौटे। आज खुपिफया एजेंसियों और सेना की ‘वांटेड’ की सूची में जिन लोगों के नाम हैं उनमें से ”यादातर इस चुनाव में मतगणना केंद्रों पर Úंट के उम्मीदवारों के प्रतिनिध्यिों के तौर पर तैनात थे। जेकेएलएपफ के मुखिया यासीन मलिक भी उस चुनाव में सैÕयद सलाहुद्दीन के इलेक्शन एजेंट थे। हाल ही में सैÕयद सलाहुद्दीन ने ‘ग्रेटर कश्मीर’ को दिए इंटरव्यू में कहा है कि 1987 के चुनाव में Úंट अगर जीत जाता तो एसेम्बली में कश्मीर का भविष्य तय करने का अध्किार पाने के लिए एक प्रस्ताव लाया जाता। इसे भारत सरकार बर्दाश्त नहीं करती और एसेंबली भंग कर दी जाती। यहीं से शुरू होती कश्मीर की आ”ाादी की असली लड़ाई। सलाहुद्दीन और उसके साथियों का उद्देश्य उस वक्त तो पूरा नहीं हुआ। बैलेट छोड़कर बुलेट थामने के पीछे मुख्य तौर पर 1987 के चुनाव में Úंट को साजिशन हराना महत्वपूर्ण कारण माना जाता है। कश्मीरी भारत से अपना जुड़ाव महसूस नहीं करता, इसका महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि किसी भी सरकार ने कश्मीरियों के भले का ख्याल नहीं रखा और कश्मीरी को हमेशा शक की न”ार से देखा। अब हालात बदल रहे हैं और आज का युवा कश्मीरी ”ोहादी नारों से बहकता नहीं, बल्कि अपना भविष्य ख़ुद तय करने का अध्किार चाहता है। वह यह तय करने का हक चाहता है कि उसे हिंदुस्तान के साथ रहना है या आजाद होना है। एक साप़फ बदलाव यह भी है कि अध्सिंख्य कश्मीरी पाकिस्तान के साथ नहीं रहना चाहते। महनूर से लेकर आगा शाहिद अली की ग़”ालों में भी वतन के लिए जो तड़प है वह कोई पाकिस्तान की गोद में बैठने के लिए नहीं है, बल्कि सम्मान के साथ जीने के लिए है। इसका हक कश्मीरी चाहते हैं और वह मिलना भी चाहिए। उसका तरीका क्या हो, यह कश्मीरियों के साथ बैठकर तय करना होगा। जब तक यह नहीं होता, हिंदुस्तान बनिहाल टनल के इस पार ही रहेगा।

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