शुक्रवार, 8 अगस्त 2008
तीसरा मोर्चा : भ्रान्ति की पठकथा
विश्वास मत के दौरान कांग्रेस सरकार बचाने में लगी थी और विपक्षी दल भाजपा और वाममोर्चा मिलकर सरकार गिराने पर आमादा थे। अपने-अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए इन दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों ने संसद की और अपनी गरिमा के साथ जो खिलवाड़ किया वह सबके सामने आ ही चुका है और चर्चा का विषय भी बना हुआ है। जब राष्ट्रीय पार्टियों की दुर्गति का आलम यह हो तो पिफर ‘भानमती का कुनबा’ या ‘चूं-चूं का मुरब्बा’ कहे जाने वाले तीसरे मोर्चे की बिसात ही क्या है? तीसरे मोर्चे के इतिहास को देखते हुए उससे यह उम्मीद वैसे भी नहीं लगाई जानी चाहिए कि वह संसद को कोई सार्थक दिशा दे पाएगा। क्यों? इसलिए कि तीसरे मोर्चा जब खुद की ही दिशा आज तक तय नहीं कर पाया तो संसद को दिशा देने का प्रश्न ही नहीं उठता। बार-बार बनकर बिखर जाने वाले इस से मोर्चे से कोई उम्मीद भला कैसे लगाई जा सकती है। तीसरे मोर्चे ने पहली बार नेशनल Úंट ;1989-1991द्ध के रूप में भारतीय राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई पर यह गठजोड़ ज्यादा दिन स्थायी नहीं रह पाया और बिखर गया। 1996 के आम चुनावांे मे जनता ने किसी पार्टी को बहुमत नहीं दिया, भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप मे उभरी, लेकिन भाजपा की सरकार महज दो हफ्रतों में गिर गई। कांग्रेस जो उस समय दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी, उसने सरकार बनाने की बजाए किसी और पार्टी को समर्थन देना उचित समझा। इसी से ‘यूनाइटेड Úंट’ ;1996-1998द्ध का उदय हुआ, जो तीसरे मोर्चे का दूसरा प्रयोग था। कांग्रेस और वाम मोर्चे के समर्थन से ‘यूनाइटेड Úंट’ की सरकार बनी। जुगाड़ की दम पर बने तीसरे मोर्चे का यह प्रयोग भी ज्यादा दिन नहीं चला। प्रधनमंत्राी एचडी देवगौड़ा को पद छोड़ना पड़ा। इस तरह देखा जाए तो जुगाड़ की दम पर बनने वाला तीसरा मोर्चा देश को चार प्रधनमंत्राी दे चुका है पर कोई भी प्रधनमंत्राी ज्यादा दिनांे तक टिक नहीं पाया। केंद्रीय सत्ता में आने के बावजूद तीसरा मोर्चा अपनी कोई अहमियत भारतीय राजनीति में दर्ज नहीं करा पाया है। इनका पूरा कार्यकाल सहयोगी दलांे को सहेजने और उनकी मांगों को पूरा करने में ही लगा रहा। राजनेताओं की मानें तो तीसरे मोर्चे का मुख्य उद्देश्य कांग्रेस और भाजपा से समान दूरी बना कर अपने आप को मजबूत करने का था। पर यह उद्देश्य कभी पूरा नहीं हुआ। अब तक इस मोर्चे के लगभग सभी घटक दल केंद्र में किसी न किसी गठबंध्न के साथ सत्ता सुख भोग चुके हैं। विचारधरा और उद्देश्यों की समानता का नाम लेकर समर्थन करने वाले ये घटक कभी राजग के साथ खड़े हो जाते हैं तो कभी संप्रग के साथ। गठबंध्न की राजनीति में इन दलों की विचारधरा के साथ इतना घालमेल हो चुका है कि आज इन दलों के कार्यकर्ता अपने दल की मूल विचारधरा ही नहीं खोज पा रहे हैं। तीसरे मोर्चे के व्यवहार को देख कर लगता है कि किसी मौके के अभाव में तीसरा मोर्चा कुछ हद तक संगठित रहता है पर जैसे ही कोई मौका आता है, जब तीसरा मोर्चा अपनी तटस्थता दिखा सकता है, मोर्चे में शामिल होने वाले सभी दल अपनी-अपनी संख्या और हैसियत के हिसाब से मोलभाव शुरू कर देते हंै और तीसरा मोर्चा पिफर किसी गुमनाम से चैराहे पर अपने मुद्दों को भुलाकर भ्रमित स्थिति में खड़ा रह जाता है । यही कारण है कि भारतीय राजनीति के दो ध््रुव कांग्रेस और भाजपा से अलग कोई तीसरा सशक्त मोर्चा अब तक खड़ा नहीं हो पाया। मोर्चे में हालिया बिखराव मनमोहन सिंह सरकार के विश्वास मत के दौरान बखूबी देखने को मिला। समाजवादी पार्टी जो तीसरे मोर्चे की जबरदस्त पैरोकार रही है, और उसी की पहल पर ही यूएनपीए खड़ा हुआ, जिसमें वे सभी पाटियों शामिल हुईं हैं जो न तो राजग मंे थीं और न ही संप्रग में। इस मोर्चे का अगुवाकार रही समाजवादी पार्टी अपने ही खड़े किए हुए यूएनपीए को छोड़ कर अलग हो गई और विश्वासमत के समय संप्रग के पक्ष में वोट दिया। इसी तरह कई अन्य दल भी अंत तक सौदेबाजी में पफंसे रहे और जब सौदा नहीं पटा तब तीसरे मोर्चे के साथ खड़े हो गए। इस बार भी जुगाड़ ने मुख्य भूमिका निभाई। यह शायद जुगाड़ ही था जो वामदलों को सपा की बजाए बसपा के पास ले आया। तीसरे मोर्चे का वैचारिक पैरोकार रहा वामदल हमेशा से तीसरे मोर्चे को मजबूत करने की वकालत करता है, पर ऐसा कर नहीं पाता है। अब वाममोर्चा बसपा सुप्रीमो मायावती में संभावनाएं तलाश रहा है। उसने विश्वास मत की सौदेबाजी में मायावती को प्रधनमंत्राी पद का दावेदार तक बना दिया, और मायावती भी अपने चिर-परिचित अंदाज को बदल कर अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर अपने ज्ञान की झलक दिखाने में जुट गईं। परंतु सिपर्फ ईरान गैस पाइपलाइन का मसला उठा देने से या परमाणु करार को मुस्लिम विरोध्ी घोषित कर देने से मायावती अंतर्राष्ट्रीय मामलों की विशेषज्ञ नहीं मानी जा सकती। मायावती कभी तीसरे मोर्चे का हिस्सा नहीं रहीं, परंतु विश्वासमत के दौरान जब संसद और देश विश्वसनीयता के मानदंडों से जूझ रहे थे उस समय मायावती अचानक तीसरे मोर्चे में जा कूदीं और तीसरे मोर्चे ने भी उन्हें अचानक अपने नेता के रूप में लपक लिया। अपनी अविश्वसनीयता और हल्केपन को साबित करने के लिए इससे बड़ी कोई दूसरी कसौटी हो सकती है? संसद की गरिमा में संेध् लगाने का काम तीसरे मोर्चे के नेताओं ने इस विश्वास मत के दौरान इतनी आसानी से कर लिया, इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर दो नेता उभरे, वे हैं एचडी देवेगौड़ा और अजित सिंह। मायावती के व्यक्तित्व में भावी प्रधनमंत्राी के गुणों को बखानते हुए ये दोनों नेता अपने दल-बल के साथ जितनी तेजी से तीसरे मोर्चे का हिस्सा बनने को आतुर दिखे और सरकार के खिलापफ वोट देने जैसी घोषणा करने लगे, उसी तेजी के साथ वे ये कहते हुए वापस भी लौटते हुए नजर आए कि वोट के बारे में पफैसला वे मतदान से कुछ समय पूर्व ही ले पाएंगे। तीसरे मोर्चे की नीयती ही एक पार्किंग लाट बनना रह गया है जब किसी पार्टी को कहीं जगह नहीं मिलती है तो वह यहां पर अपनी गाड़ी खड़ी कर देता है और नई संभावना जब दिखाई देती है तब अपनी गाड़ी के साथ चलता बनता है। पार्किंग की जगह पर गाड़ियां आती हैं और चली जाती हैं। वहां समाज का प्रतिबिंब बन सकने वाली इमारतें खड़ी नहीं की जा सकतीं।
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