बुधवार, 17 सितंबर 2008

कश्मीर के खलनायक का नाम - धरा 370

कश्मीर के खलनायक का नाम - धरा 370

विधन सभा में जब कश्मीर के लिए धरा 370 पर बहस चल रही थी, उस समय इसका नाम धरा 370 नहीं था। इसका नाम था - धरा 306-ए। संविधन जब अंतिम रूप से स्वीकार कर लिया गया तो इसका नाम पड़ा - धरा 370 और तबसे इसे इसी नाम से जाना और पुकारा जाता है। श्रीअमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी जाने वाली जमीन को लेकर कश्मीर घाटी में जिस तरह का भारत-विरोध्ी अलगाववादी आंदोलन चला, जिस तरह भारत का तिरंगा जलाकर राख कर दिया गया, जिस तरह खुलेआम पाकिस्तानी झंडे लहराए गए, और जिस तरह हुर्रियत नेता गिलानी ने इस्लामी भाइचारे की दुहाई देते हुए कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने की खुलेआम वकालत की, इस तमाम संदर्भ में देश की राजनीति में धरा 370 बहस के केंद्र में उभरकर आ गई है। यह शिद्दत से अनुभव किया जाने लगा है कि कश्मीर में जिस तरह का अलगाव खुलेआम पनपा और पनपने दिया गया उसकी जड़ में धरा 370 ही है जिसके कारण वहां भारत के विरोध् में कुछ भी बोलने की मानो आजादी सी मिली हुई है। दूसरी ओर यह भी अनुभव किया जा रहा है कि इन अलगाववादी स्वरों को नियंत्राण में लाने में जो सबसे बड़ी अड़चन सामने आ रही है, उसका नाम भी धारा 370 ही है। यानी कश्मीर में अलगाववाद को पैदा करने का कारण यदि धारा 370 है, तो उस अलगाववाद को खत्म न कर पाने में देश की मजबूरी का कारण भी धरा 370 ही है। आजादी के बाद जब देश का संविधन बनाने के लिए संविधन सभा डाॅ. आम्बेडकर द्वारा बनाए गए प्रारूप पर क्रमशः विचार कर रही थी और जब उस विचारक्रम में धारा 370 ;यानी धरा 306एद्ध पर विचार-विमर्श शुरू हुआ तो इस धरा को संविधन सभा में रखते हुए गोपाल स्वामी आयंगर ने स्पष्ट आश्वासन दिया था कि यह धरा बहुत जल्दी हट जाएगी। संविधन स्वीकार होने के कुछ वर्षों बाद खुद भारत के प्रधनमंत्राी नेहरू ने लोकसभा में अपने एक भाषण में कहा था कि धरा 370 बहुत कुछ घिस चुकी है और जो शेष रह गई है वह भी ध्ीरे-ध्ीरे घिस जाएगी। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्राी गुलाम मोहम्मद सादिक ने ;जो उस समय जम्मू-कश्मीर के प्रधनमंत्राी कहे जाते थेद्ध 1963 में, यानी आजादी मिलने के डेढ़ दशक बाद अपने एक भाषण में कहा था कि कश्मीर राज्य में कानून और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए धरा 370 का तुरंत हट जाना बहुत जरूरी है। प्रधनमंत्राी बनने के बाद उन्होंने कांग्रेस संसदीय दल की एक बैठक में कहा था कि यह धरा राज्य की प्रगति में बाध्क सि( हो रही है और इसलिए इसको संविधन से अविलंब हटा दिया जाना चाहिए। यह बात दीगर है कि जम्मू-कश्मीर का प्रधनमंत्राी बनने के कुछ वर्षों बाद वे अपनी ही कही हुई बात से पलट गए। संविधन सभा में जब धरा 370 पर बहस चल रही थी तो संविधन सभा के ही एक सदस्य हसरत मोहानी ने गोपालस्वामी आयंगर से यह पूछा कि जब जम्मू-कश्मीर राज्य का विलय दूसरे देशी राज्यों की तरह भारत संघ में हुआ है और जम्मू-कश्मीर समेत सभी राज्यों ने एक जैसे विलयपत्रा पर हस्ताक्षर किए हैं तो सिपर्फ जम्मू-कश्मीर के लिए ही धरा 370 के रूप में विशेष प्रावधन क्यों किया जा रहा है? इस सवाल के जवाब में गोपालस्वामी आयंगर ने कई कारण गिनाए थे जिनमें प्रमुख कारण यह कहा गया कि जम्मू-कश्मीर पर एक सशस्त्रा आक्रमण हुआ है जो अभी तक जारी है और स्थिति असामान्य बनी हुई है। राज्य के भीतर एक यु( चल रहा है। इसलिए असामान्य स्थिति में राज्य का प्रशासनतंत्रा भी असामान्य रूप से ही चलाया जाना चाहिए। धरा 370 इसी पृष्ठभूमि में रखी जा रही हैं। इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए प्रधनमंत्राी नेहरू ने भी कहा था कि जम्मू-कश्मीर के लोग भारत के अन्य राज्यों की तरह खुद को भारत का सहज नागरिक मानें इसके लिए उन्हें कुछ समय और उचित वातावरण दिया जाना चाहिए और धरा 370 का प्रावधन उसी संदर्भ में किया जा रहा है। यानी जम्मू-कश्मीर के लोगों को एक असामान्य स्थिति से निकलकर सामान्य स्थिति में आने की सुविध प्रदान करने के लिए ही धरा 370 नामक प्रावधन का निर्माण किया गया था। लेकिन उसके कारण घाटी के लोग, जो आज शत-प्रतिशत मुस्लिम है,ं क्योंकि करीब साढ़े चार-पांच लाख हिन्दू पंडित वहां से निकलने को मजबूर कर दिए गए, भारत के सहज और सामान्य नागरिक तो आज तक बन नहीं पाए बल्कि वे अलगाववादी राजनीति का शिकार होकर भारत विरोध्ी हो चुके हैं और ध्र्म के आधार पर उन्हें पाकिस्तान का हिस्सा बनने के लिए लगातार उकसाया जा रहा है। इसमें अचरज की बात यह है कि कश्मीर की जनता को अलगाववाद का प्रशिक्षण देने वाले, उन्हें पाकिस्तान परस्ती सिखाने वाले भारत विरोध्ी नेताओं को न केवल हर केंद्रीय सरकार द्वारा शह मिलती रही है बल्कि उन्हें बार-बार बातचीत के लिए बुलाकर परोक्ष रूप से राजनीतिक मान्यता भी प्रदान कर दी गई है। इस संपूर्ण पृष्ठभूमि में यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि धरा 370 कश्मीर घाटी को भारत से जोड़ने के बजाए भारत से अलग होने देने का एक मंच बन गई है और उस मंच का उपयोग करने वाले तमाम भारतद्रोही नेताओं को इसी धरा के कारण राजनीतिक मान्यता भी प्रदान कर दी गई है। यह इसी धरा का कमाल है कि कश्मीर में स्थित अमरनाथ मंदिर की यात्रा करने वाले भारतीयों की सुविध के लिए श्रीअमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी जाने वाली जमीन को वापस लेने का पफैसला इन्हीं अलगाववादी और भारतद्रोही नेताओं के दबाव में आकर ले लिया जाता है और भारत सरकार का एक नुमाइंदा यानी जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल एनएन वोहरा इस पफैसले पर अपनी मुहर लगाने से भी कोई परहेज अनुभव नहीं करते। इसलिए हर राजनीतिक पार्टी, कुछ खुलेआम तो कुछ आॅपफ द रिकार्ड ब्रीपिफंग में धरा 370 की उपयोगिता पर सवाल खड़े करने लगे हैं। इस परिप्रेक्ष्य में यह जानना दिलचस्प होगा कि इसी धरा के तहत जम्मू-कश्मीर को यह सुविध प्रदान की गई कि वह भी अपना एक संविधन अलग से बना ले और जम्मू-कश्मीर के इसी संविधन की प्रस्तावना में यह लिखा हुआ है कि ‘हम जम्मू तथा कश्मीर राज्य के लोग इस राज्य के भारत के साथ विलय के, जो 26 अक्टूबर 1947 को हुआ था, अनुसरण में इस राज्य की भारत संघ के साथ उसके अभिन्न अंग के रूप में वर्तमान संबंधें की आगे परिभाषा करने का दृढ़ संकल्प लिए हुए हैं।’ भारत की संविधन सभा में भी गोपालस्वामी आयंगर ने अपने भाषण के अंत में सापफ कर दिया था कि ‘जब राज्य की संविधन सभा बैठ जाए और राज्य के संविधन के लिए और राज्य पर पफेडरल क्षेत्राध्किार की सीमा के संबंध् में अपना निश्चय कर चुके तो इस संविधन सभा की सिपफारिश पर राष्ट्रपति एक आदेश निकालेंगे कि यह अनुच्छेद 306ए ;जो अब धरा 370 हैद्ध या तो प्रवृत्त न रहेगा अथवा केवल ऐसे अपवादों और उपभेदों के अध्ीन प्रवृत्त होगा जो राष्ट्रपति द्वारा उल्लेख किए गए हों।’ कोई शक नहीं कि धरा 370 को समाप्त करने के लिए देश की संसद को जिस कानूनी पृष्ठभूमि की ”ारूरत है, उस पृष्ठभूमि को, गोपालस्वामी आयंगर के बयान और जम्मू-कश्मीर के संविधन की प्रस्तावना को एक साथ मिलाकर पढ़ा जाए तो वह देश को सहज रूप से उपलब्ध् है और इसका उपयोग कर संसद जब चाहे धरा 370 को समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू कर सकती है और उसे समाप्त कर सकती है। तो प्रश्न उठता है कि जब स्थितियां इतने सहज रूप से उपलब्ध् हैं, जब संपूर्ण देश का मानस धरा 370 के खिलापफ बन चुका है, जब यह शीशे की तरह सापफ हो चुका है कि कश्मीर घाटी के अलगाववादी और भारतद्रोही नेताओं ने इस धरा का उपयोग सिपर्फ और सिपर्फ कश्मीर को भारत से अलग करने की अपनी कुत्सित राजनीति चमकाने में किया है, ऐसे में इस धरा को संविधन से अपेंडिक्स की तरह निकालकर बाहर पफेंकने में अड़चन क्या है? संविधन विशेषज्ञ सुभाष कश्यप इसे वोट बैंक की मजबूरी मानते हैं, उनका कहना है कि देश और घाटी के सभी राजनीतिक दल इसे वोटों के चश्मे से ही देखने के अभ्यस्त हो चुके हैं और उनमें साहस नहीं आ रहा कि वे अपने को बदलें और भारत की एकता और अखंडता के संदर्भ में सोचने का अभ्यास डालें। रूटस इन कश्मीर संगठन के प्रवक्ता आदित्य राज कौल का मानना है कि अलगाववादी नेताओं ने धरा 370 का राजनीतिक दुरुपयोग इस हद तक कर लिया है कि उन्होंने श्रीअमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी जाने वाली जमीन के मसले को भी बिना किसी कठिनाई के और बड़े ही आराम से अपनी अलगाववादी राजनीति में ढालकर घाटी की पूरी मुस्लिम जनता को सड़क पर ला खड़ा कर दिया है। इन दोनों विचारकों द्वारा दिए गए कारण की मीमांसा की जाए तो एक ही बात समझ में आती है कि धरा 370 हटाने की बात करते ही जहां जम्मू, लद्दाख और शेष भारत में स्वीकृति और खुशी की लहर उमड़ पड़ेगी, वहीं घाटी की मुस्लिम आबादी इसके विरोध् में सड़कों पर हिंसक आंदोलन करती नजर आएगी। भारत की मुस्लिम राजनीति पर जिन क्षुद्र और संकीर्ण नेताओं का इस समय कब्जा है, वे, तथा घाटी और पूरे भारत में आतंकवादी हिंसाकांड करने वाले तत्व इसे तुरंत एक मुस्लिम तथा अल्पसंख्यक और मानवाध्किार का प्रश्न बनाकर उभार देंगे। भारत के वे तमाम राजनीतिक दल जो ध्र्मनिरपेक्षता की आड़ में और अल्पसंख्यकों के हितचिंतक होने का नारा लगाकर देश के बारह-तेरह प्रतिशत मुस्लिम वोट पर आंख गड़ाए रहते हैं, वोटबैंक की राजनीति करने वाले ऐसे तमाम दलों की पूरी राजनीति ही खत्म हो जाएगी और वे नेता और वे दल ऐसा भला क्यों होने देना चाहेंगे? अर्थात शु( वोटबैंक की राजनीति के कारण देश के तमाम राजनीतिक दल धरा 370 को खत्म करने का नाम भी नहीं लेते और वे कश्मीर को अलगाववादी और भारतद्रोही नेताओं के हाथों गिरवी जाता हुआ टुकुर-टुकुर देख रहे हैं, लेकिन अपनी राजनीति से बाज नहीं आ रहे। कभी धरा 370 को हटाने की बढ़-चढ़कर बातें करने वाली भाजपा भी अब इसी वोटबैंक राजनीति का एक हिस्सा बन चुकी है। यह इसी बात से जाहिर है कि वह श्रीअमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी जाने वाली जमीन के मामले पर तो खूब शोर मचा रही है, लेकिन धरा 370 के नाम पर उसने भी चुप्पी साध् रखी है। भाजपा के इस रुख ने विस्थापन का जीवन जी रहे कश्मीरी पंडितों को और देशप्रेमियों को हताश कर दिया है। केंद्र में राजग के सत्ता में आने से इन पंडितों और भारत की एकता में विश्वास रखने वालों के दिलों में एक उम्मीद जगी थी कि अब धरा 370 पर कोई निर्णायक कदम उठाया जाएगा। लेकिन राजग का हिस्सा बनने की एक शर्त के रूप में भाजपा ने अपना यह मुद्दा छोड़ने में पलक झपकने जितनी देर भी नहीं लगाई और अपनी भूमिका को दूसरे राजनीतिक दलों की तरह संदिग्ध् बना दिया। भारत के राजनीति दलों के वोटबैंक का इस कदर शिकार हो जाने के कारण धरा 370 पर चुप्पी साध् लेने का ही नतीजा है कि कश्मीर की पीडीपी और नेशनल कांÚेंस जैसी मुख्यधरा पार्टिंयों को भी अब अलगाववादी और भारतद्रोही राजनीति करने में कोई हर्ज महसूस नहीं हो रहा। जो नेशनल कांÚेंस कभी पाकिस्तान को दुश्मन नंबर एक करार देती थी, वह अब पाकिस्तान परस्त गिलानी की हमसपफर बन गई नजर आ रही है। जो पीडीपी नेता मुफ्रती मोहम्मद सईद कभी भारत के गृहमंत्राी के रूप में भारत की एकता की कसमें खाते थकते नहीं थे, वही मुफ्रती आज आतंकवादियों और पाकिस्तान परस्त अलगाववादियों की पैरवी करने वाली पार्टी के नायक बन चुके हैं। जब भारत के सभी राजनीतिक दल और राजनेता वोटबैंक की राजनीति का शिकार हो चुके हों और कश्मीर घाटी की मुख्यधरा पार्टियां अलगाववादियों और आतंकवादियों की हमसपफर बनने को तैयार हो चुकी हों, ऐसे में भारत की एकता और अखण्डता की चिंता भला किसे हो सकती है? जब मानसिकता यह हो, ऐसे में धरा 370 को खत्म करने के लिए कोई भी नेता या दल अपना कदम क्यों आगे बढ़ाएगा? और कैसे? इस सबके बावजूद अगर कश्मीर घाटी भारत का हिस्सा बनी रही तो इस चमत्कार की सिपर्फ एक ही वजह होगी और उस वजह का नाम है - भारत की जांबाज सेना, जिस पर भारत की जनता का भरोसा हमेशा की तरह बदस्तूर कायम है।


धरा 370 के पक्ष में नहीं थे आम्बेडकर
डाॅ. भीमराव आम्बेडकर की ख्याति एक राष्ट्रवादी देशभक्त की है। वे स्वतंत्रा भारत के पहले कानून मंत्राी थे और संविधन का ड्राफ्रट बनाने वाली कमेटी के अध्यक्ष भी। उन्हें यह बात सिरे से ही स्वीकार नहीं थी कि जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष संवैधनिक अध्किार प्रदान किए जाएं, क्योंकि वे भारत के सभी राज्यों के लिए हर तरह की संवैधानिक समानता के प्रबल पक्षध्र थे। वैसे भी न तो जम्मू-कश्मीर के लोगों ने और न ही संविधन में उल्लिखित ‘हम भारत के लोगों’ ने ऐसी कोई मांग रखी थी कि जम्मू-कश्मीर को विशेष संवैधनिक अध्किार दिए जाएं। जब शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने डाॅ. आम्बेडकर के पास जाकर संविधन में जम्मू-कश्मीर के लिए विशेष अध्किारों की मांग की तो डाॅ. आम्बेडकर का जवाब कुछ इस तरह का था - ‘आप चाहते हैं कि भारत कश्मीर की रक्षा करे, पूरे भारत में कश्मीरियों को हर तरह के समान अवसर प्रदान किए जाएं, लेकिन आप भारत और भारतीयों को वही अध्किार कश्मीर में नहीं देना चाहते। मैं भारत का कानूनमंत्राी हूं और राष्ट्रीय हितों के खिलापफ किसी भी तरह की गतिविध् िमें मेरी हिस्सेदारी हो ही नहीं सकती।’ जब भारत के विश्वविख्यात विध्मिंत्राी और संविधन-निर्मात्राी समिति के अध्यक्ष की राय यह हो तो यह सचमुच एक षड्यंत्रा सरीखा ही लगता है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू के कहने पर एन गोपालस्वामी आयंगर ने संविधन के प्रारूप में धरा 306-ए का प्रस्ताव रखा और 17 अक्टूबर 1949 के दिन संविधन सभा के पटल पर उस प्रस्ताव का रखा जाना, उस पर बहस और उसकी स्वीकृति सब एक साथ हो गए और इसी धरा को तब धरा 370 का नाम दिया गया।

धरा 370 के पक्ष में एक कुतर्क

कई बार यह तर्क दिया जाता है कि जम्मू-कश्मीर के लिए बनाई गई धरा 370 पर इतना शोर मचाने की जरूरत क्या है क्योंकि, महाराष्ट्र, गुजरात, नगालैंड, असम, मणिपुर, आंध््र प्रदेश, सिक्किम, मिजोरम, अरुणाचल और गोवा के लिए भी तो संविधान की धरा 371 और धरा 371-ए के अंतर्गत विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं। ऐसा तर्क देने वाले यह बात भूल जाते हैं कि इन सभी राज्यों के लिए की गई व्यवस्थाएं कुछ इस प्रकार की हैं कि वहां किसी वर्ग विशेष को ऐतिहासिक कारणों से अगर सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक पिछड़ापन झेलना पड़ रहा है और सामान्य कानूनी प्रावधनों से उन्हें दूर करना आसान नजर नहीं आ रहा तो इन राज्यों के लिए संविधन की धरा 371 का उल्लेख करते हुए ऐसे विशेष प्रावधन किए जा सकते हैं जिनकी सहायता से इस पिछड़ेपन को दूर किया जा सके। अर्थात इन राज्यों के लिए किए गए प्रावधन में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि धरा 371 और धरा 371-ए केंद्र सरकार के हाथ बांध् देती हो या सत्ता के दो समानान्तर केंद्रों को जन्म दे देती हो। केंद्र जब चाहे धरा 371 और धरा 371-ए में परिवर्तन, संशोध्न इत्यादि कर सकता है और इसके लिए इन राज्यों से अनमुति जैसी लेने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके विपरीत धरा 370 देश में दो संविधनों और दो सत्ता केंद्रों को जन्म देने का कारण बनी है और इसी धरा के कारण केंद्र सरकार का कोई भी कानून तब तक जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं हो सकता जब तक जम्मू-कश्मीर की विधनसभा उसे स्वीकार न कर ले।


धरा 370: एक संवैधनिक विसंगति

धरा 370 इस हद तक गैरकानूनी जैसी नजर आती है कि यह एक ही देश के नागरिकों में असमानता, विभाजन और एकता-विरोध्ी वातावरण का निर्माण करती है तथा एक ही देश के नागरिकों को अलग-अलग वर्गों में रख देती है। यह धरा भारत के संविधन की मूलभूत संरचना के भी खिलापफ है क्योंकि यह देश के संविधन को उन संप्रभु शक्तियों से वंचित कर देती है जो शक्तियां उसे संविधन सभा ने प्रदान की थीं। मसलन भारत के किसी भी अन्य राज्य के लिए अलग से संविधन सभा नहीं बनाई गई लेकिन जम्मू-कश्मीर के लिए अलग से संविधन सभा बना दी गई। भारत के किसी भी अन्य राज्य के लिए अलग संविधन की व्यवस्था नहीं है, किन्तु जम्मू-कश्मीर के लिए अलग संविधन की व्यवस्था कर दी गई। यहां तक कि भारत के संविधन को इस संप्रभु अध्किार से भी वंचित कर दिया गया है कि वह जम्मू-कश्मीर के लिए बनाई गई इस धरा को समाप्त कर सके या इसमें कोई संशोध्न ला सके। अगर कभी भारत सरकार को धरा 370 को समाप्त करना पड़े तो वैसा करने के लिए व्यवस्था यह है कि सबसे पहले जम्मू-कश्मीर राज्य की विधनसभा इस तरह का एक प्रस्ताव पारित करेगी। विधनसभा अगर अस्तित्व में नहीं है तो वैकल्पिक तौर पर वहां के राज्यपाल जम्मू-कश्मीर संविधन की धरा 91 और 92 के तहत सम्पूर्ण विधयी और कार्यकारी शक्तियां अपने हाथों में लेते हुए इस तरह का एक प्रस्ताव राष्ट्रपति के पास भेज सकते हैं। उसके बाद भारत के राष्ट्रपति को वह प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों के पास भेजना होगा। उसके बाद संविधन की धरा 356 के तहत जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लागू कर भारत की संसद को जम्मू-कश्मीर के लिए कानून बनाने का अध्किार अपने हाथ में लेना होगा। इसके बाद ही भारत की संसद में उस प्रस्ताव पर कोई विचार-विमर्श या पफैसला किए जा सकते हैं।

जरूरत इच्छा शक्ति की

गुलाम मोहम्मद सादिक संविधन की धरा 370 को समाप्त करने पर हमेशा से आमादा रहे थे, किन्तु वे अपनी इस विचारधरा को अपनी ही पार्टी यानी कांग्रेस से कभी मनवा नहीं पाए। इसके बावजूद 1963 में वे जम्मू-कश्मीर विधनसभा से एक प्रस्ताव पास करवाने में सपफल हो गए। इस प्रस्ताव के पास होने से पहले जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्राी को वहां का प्रधनमंत्राी और वहां के राज्यपाल को वहां का सदरे रियासत ;यानी वहां का राष्ट्रपतिद्ध कहा जाता था। इस संविधन संशोध्न के बाद प्रधनमंत्राी को और सदरे रियासत को उसी तरह से क्रमशः मुख्यमंत्राी और राज्यपाल कहा जाने लगा जैसा कि भारत के अन्य राज्यों में मुख्यमंत्राी और राज्यपाल को कहा और जाना जाता है। मानो इसी संशोध्न से प्रेरणा लेकर 1964 में तब के प्रखर वक्ता और राष्ट्रवादी सांसद प्रकाशवीर शास्त्राी ने लोकसभा में धरा 370 को खत्म करने के लिए बकायदा एक संविधन संशोध्न प्रस्ताव रखा। जाहिर है कि प्रस्ताव गिर गया, परंतु उस संदर्भ में तब के केंद्रीय गृहमंत्राी गुलजारी लाल नंदा ने कहा कि इस धरा को खत्म करने के लिए किसी संविधन संशोध्न लाने और उस पर बहस की जरूरत ही नहीं है क्योंकि राष्ट्रपति एक अध्यादेश जारी कर इसे जब चाहें समाप्त कर सकते हैं। देश वास्तव में जानना चाहता है कि क्या कानूनी स्थिति वास्तव में ऐसी ही है, और अगर इसका जवाब ‘हां’ है ;वैसे हमें शक हैद्ध तो वह सौभाग्यशाली दिन देश को कब देखने को मिलेगा जिस दिन भारत का राष्ट्रपति ऐसा अध्यादेश जारी कर देगा? कश्मीर घाटी की आज की हालत को देखते हुए देश वास्तव में जानना चाहता है कि अगर कानूनी स्थिति ऐसी ही है तो हमारे मौजूदा राष्ट्रपति को ऐसा अध्यादेश जारी करने के लिए और किस बात का इंतजार है?

क्या कश्मीर एक मुस्लिम प्रश्न बन चुका है?

बनाइए धरा 370 को चुनावी मुददा

क्या कश्मीर एक मुस्लिम प्रश्न बन चुका है? ध्र्मनिरपेक्षता के नाम पर छाती कूटने वाले लोग हमारे इस सवाल से ही विलाप करने लगेंगे और हमें विशु( साम्प्रदायिक कहकर अपनी खीझ मिटाने निकल पड़ेंगे। लेकिन जब देश के शिखर से देश को तोड़ने की ध्मकियां जारी की जा रही हों, तब इस तरह के विकलांग आरोपों की परवाह किए बिना सही सोच के लोगों को सामने आकर पूछना ही पड़ता है - ‘क्या कश्मीर वास्तव में एक मुस्लिम प्रश्न बन चुका है?’ हमारा मतलब कश्मीर घाटी से है। हमारा मन भी यह कहने को करता है कि काश, कश्मीर मुस्लिम प्रश्न न बन चुका होता, क्योंकि हम भी दूसरे भारतीयों की तरह इस देश की बहुलवादी विरासत के कायल हैं और उसी के बने रहने में ही देश के अस्तित्व के बने रहने की अवधरणा के समर्थक हैं। लेकिन क्या किया जाए, जब कश्मीर का हर दूसरा नेता, बड़ा भी और छुटभैया भी, कश्मीर को सिपर्फ और सिपर्फ मुस्लिम प्रश्न बनाने पर आमादा हो, देश का हर राजनेता कश्मीर को मुस्लिम प्रश्न बनते हुए टुकुर-टुकुर देखने को मजबूर हो, देश का तमाम मुस्लिम नेतृत्व इस पर चुप्पी साध्े बैठा हो तो देश और संविधन से प्यार करने वालों को भविष्य के खतरों से आगाह करने के लिए हम जैसों को यह सवाल पूछने को मजबूर होना पड़ता है। न बन चुका होता तो क्यों कश्मीर की पीडीपी जैसी मुख्यधरा पार्टी अमरनाथ श्राइन बोर्ड को 100 एकड़ जमीन देने को कश्मीरियत पर हमला बताती? अमरनाथ का मंदिर कश्मीर में है, अमरनाथ मंदिर के लिए बनाया गया श्राइन बोर्ड जम्मू-कश्मीर विधनसभा की कानूनी संतान है, श्राइन बोर्ड को दी जाने वाली जमीन पर कब्जा किसी गैर-कश्मीरी का नहीं होने वाला। पिफर क्या वजह है कि अमरनाथ श्राइन बोर्ड को अस्थायी तौर पर दी जाने वाली जमीन को भी कश्मीरियत पर हमला माना गया? हमें कश्मीर के अलगाववादियों और दूसरी पार्टियों के नेताओं का शुक्रगुजार होना चाहिए कि वे कांग्रेस, भाजपा, लेफ्रट या सपा नेताओं की तरह दोमुंही बात नहीं करते। उन्होंने सापफ-सापफ कह दिया कि अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी जाने वाली जमीन से कश्मीर की ‘डेमोग्रापफी’ यानी जनसंख्या-चरित्रा में पफर्क आ जाएगा। इस तर्क को समझने में ज्यादा मुश्किल नहीं आती। जाहिर है कि अमरनाथ मंदिर की यात्रा करने वाले सिपर्फ और सिपर्फ हिंदू होते हैं और वे भारत के विभिन्न भागों से वहां जाते हैं। उस 100 एकड़ जमीन पर अगर अमरनाथ मंदिर की यात्रा करने के लिए जाने वाले यात्राी दो या तीन महीने के लिए वहां आते-जाते, रहते रहेंगे तो निश्चित ही कुछ समय के लिए कश्मीर घाटी में कुछ लाख हिन्दू, भले ही दो या तीन महीने के लिए, रह रहे होंगे। वे वहां स्थायी रूप से नहीं रहेंगे, यह जानते-बूझते हुए भी अगर पीडीपी और हुर्रियत के नेता भारत के इन हिन्दुओं के इस अस्थायी आवागमन को भी जनसंख्या चरित्रा में खलल मानते हैं तो संदेश सापफ है कि कश्मीरी राजनेता और अलगाववादी अब घाटी में अस्थायी रूप से भी किसी हिन्दू के रहने को बर्दाश्त नहीं कर सकते। इस समय कश्मीर घाटी की लगभग तमाम जनसंख्या मुस्लिम है और इस तर्क का अर्थ यही निकलता है कि कश्मीर के सभी राजनेता और अलगाववादी इस बात पर एकमत हैं कि कश्मीर घाटी में सिपर्फ और सिपर्फ मुस्लिम आबादी ही बसनी चाहिए, किसी गैर-मुस्लिम को अस्थायी रूप से भी वहां नहीं रहने दिया जाना चाहिए। अगर इस तर्क को समझने में किसी कथित ध्र्मनिरपेक्ष दिमाग को मुश्किल आ रही हो तो उसकी मुश्किल को दूर करने के लिए हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी ने एक रैली में सापफ तौर पर कह दिया कि हम कश्मीर के लोग मुसलमान हैं, पाकिस्तान एक इस्लामिक देश है और मुसलमान होने के नाते हम भारत की बजाए पाकिस्तान के साथ ज्यादा सहज और स्वाभाविक अनुभव करते हैं इसलिए कश्मीर को भारत से अलग होकर पाकिस्तान का हिस्सा बन जाने में ही कश्मीरियों को ठीक अनुभव होगा। इतना घनघोर सांप्रदायिक बयान देने वाले अलगाववादी गिलानी यह बयान देने के बाद आराम से अपने घर चले जाते हैं। वे गिरफ्रतार नहीं होते, उन पर देशद्रोह का कोई मुकदमा नहीं चलता। इस सबका क्या अर्थ निकाला जाए? इसका एक और सिपर्फ एक ही मतलब निकलता है कि शायद भारत सरकार गिलानी के इन उद्गारों को गैरकानूनी उद्गार नहीं मानती, उनके इस बयान को देशद्रोह की परिभाषा में नहीं रखती और इसलिए कोई आश्चर्य नहीं होगा कि भविष्य में होने वाले किसी कश्मीर-संवाद में यही देशद्रोही गिलानी भारत सरकार के सम्मानित अतिथि के रूप में शिरकत करते आपको न”ार आएं। कश्मीर की पीडीपी जैसी पार्टियां हुर्रियत सरीखे अलगाववादियों के सुर में सुर मिलाते हुए, कश्मीर के मुस्लिम चरित्रा को रेखांकित करते हुए, उसे बरकरार रखने को सड़कों पर हिंसा करने निकल आती हैं। इस मुस्लिम चरित्रा को गर्व से भरी अपनी शब्दावली में पेश करते हुए गिलानी पाकिस्तान में मिल जाने का आह्वान करते हैं। यानी देश के ध्र्मनिरपेक्ष संविधान की खुली अवज्ञा कश्मीर की सड़कों पर होती है, देशद्रोह के लिए खुला आह्नान कश्मीर की सड़कों पर किया जाता है, और ये दोनों काम मुस्लिम आबादी के नाम पर किए जाते हैं। इसके बावजूद देश का संपूर्ण मुस्लिम नेतृत्व मुंह पर पट्टी बांध्े रहता है, एक शब्द अपने मुंह से नहीं निकालता, इसकी निंदा करने का तो सवाल भी दूर-दूर तक नहीं उठता। इस सबका क्या मतलब निकाला जाए? इसका एक ही मतलब निकलता है और वह मतलब वही है जिसकी ओर हमने अपने इस आलेख के शुरू में ही एक सवाल उठाकर इशारा किया है। हम पिफर से सवाल पूछ रहे हैं कि क्या कश्मीर एक मुस्लिम प्रश्न बन चुका है? ऊपर दिए गए तर्कों की श्रृंखला को देखते हुए अगर अब भी किसी को इस प्रश्न पर ऐतराज हो, या उसे यह प्रश्न गलत लगता हो, या किसी को यह प्रश्न अनावश्यक लगता हो तो हम इस पर बहस के लिए तैयार हैं। क्योंकि हमें यह सापफ-सापफ लग रहा है कि कश्मीर एक मुस्लिम प्रश्न बन चुका है, बावजूद इसके कि सम्पूर्ण जम्मू-कश्मीर राज्य में हिंदू पर्याप्त संख्या में हैं, वहां बौ(ों की भी अच्छी-खासी संख्या है, इसके बावजूद हमें सापफ लग रहा है कि कश्मीर यानी कश्मीर घाटी एक मुस्लिम प्रश्न बन चुका है। अगर हमारा यह निष्कर्ष गलत है तो हमें खुशी होगी। हम चाहते हैं कि हमारा यह निष्कर्ष गलत हो, क्योंकि भारत के करोड़ों लोगों की तरह हमारी आस्था भी भारत के बहुलतावादी स्वरूप में है और हम नहीं चाहते कि भारत का कोई एक राज्य या कोई एक इलाका ध्र्म या जाति की दृष्टि से एक सरीखी जनसंख्या वाला होकर भारत के सम्पूर्ण संवैधनिक आकार को सै(ांतिक चुनौती जैसी देने लगे। इसलिए हम वास्तव में चाहते हैं कि हमारा निष्कर्ष गलत हो। लेकिन कश्मीर की स्थितियां जिस कदर मुंह बाए हमारे सामने खड़ी हैं उसे देखते हुए हमारे चाहने या न चाहने से क्या पफर्क पड़ने वाला है? कश्मीर हर हिसाब से एक मुस्लिम प्रश्न बना दिया गया है जो कि संविधन के खिलापफ है और देश की राजनीति उसे मुस्लिम प्रश्न नहीं बना रहने देगी, इसे साबित करने के लिए हमें यह देखना होगा कि क्या आगामी लोकसभा चुनावों में कोई पार्टी धरा 370 को खत्म करने का वायदा करने के नाम पर चुनाव मैदान में उतरती है या नहीं। कश्मीर एक मुस्लिम प्रश्न बना रहेगा या नहीं, इसकी कसौटी हम इस बात में क्यों ढूंढ रहे हैं कि आगामी लोकसभा चुनावों में कोई पार्टी धरा 370 खत्म करने को चुनावी मुद्दा बनाती है या नहीं? इसलिए कि हमें इस सवाल का जवाब नहीं मिल पा रहा कि संविधन स्वीकार हुए आध्ी सदी से ज्यादा समय बीत चुका और क्यों कोई पार्टी या सरकार इस धरा को खत्म करने के सवाल पर कुछ बोलने को तैयार नहीं हो रही? हम जानते हैं कि यह धरा आज भी भारत के संविधन में अस्थायी धरा के रूप में ही लिखी पड़ी है। तो पिफर क्या कारण है कि इस अस्थायी धरा का जीवन इतना लंबा होने दिया गया और आज हालत यह बना दी गई है कि देश का कोई भी प्रमुख राजनीतिक दल और केंद्र में शासन करने वाली कोई भी पार्टी या गठबंध्न की सरकार इस धरा को खत्म करने की बात तक जुबान पर नहीं लाती? एक जमाना था जब सांप्रदायिक होने के आरोप की लाठी खाते हुए भी भाजपा इस धरा को खत्म करने की बड़कें मारा करती थी। लेकिन वह भी इस लाठी की मार बहुत दिनों तक नहीं सह सकी और एनडीए का अंग-प्रत्यंग बनने के उत्साह में उसने अपनी इस बड़क से तौबा कर ली। और यह तब है जब सारा देश यह देखने को बाध्य हैै कि कश्मीर में आज जो भी अलगाववाद है, जो भी पाकिस्तान-प्रेरित आतंकवाद है, जो भी कश्मीरियत की दुर्भाग्यपूर्ण साम्प्रदायिक परिभाषा की जा रही है, जितने भी देशद्रोहपूर्ण भाषण वहां दिए जा रहे हैं, भारत से आजाद होने के नाम पर जितनी रैलियां और उपद्रव वहां किए जा रहे हैं, इस सबके बावजूद देशद्रोही और अलगाववादी नेताओं पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा पा रही। इन सबका एक ही कारण है और उस कारण का नाम है - ‘धरा 370’। हमारे इस आलेख के साथ जितने भी अन्य आलेख और रिपोर्र्टें आवरण कथा के हिस्से के रूप में पाठकों के सामने हैं, उन सभी का निष्कर्ष एक ही है कि कश्मीर की मौजूदा हालत का कारण और उस हालत को ठीक न कर पाने में भारत की हर केंद्रीय सरकार की असपफलता और विवशता, इन सभी का एकमात्रा कारण है - ‘धरा 370’। इसलिए हमें यह देखकर हैरानी होती है कि जब सारा देश लगभग एक ही तरह का निष्कर्ष निकालने की स्थिति में आ चुका है तो भी संविधन में वह धरा अभी तक क्यों चलने दी जा रही है, जिसे एक अस्थायी व्यवस्था के रूप में संविधन निर्माताओं ने भारत की इस पवित्रा पुस्तक का हिस्सा बनाया था? आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्यों कोई भी पार्टी इस अस्थायी संवैधनिक उपबंध् को खत्म करने के लिए हिम्मत नहीं जुटा पाती? देश में ऐसी कौन-सी खौपफनाक हालत है कि हर पार्टी और हर सरकार इस धरा को लेकर होंठ सिले रहती है? ऐसी कोई खौपफनाक हालत देश में नहीं है। पर हमें जो बात समझ में आ रही है और हम चाहते हैं कि हमारी यह समझ गलत साबित हो, लेकिन दुर्भाग्यवश वह समझ गलत साबित होती हुई नजर नहीं आ रही कि कोई भी राजनीतिक दल सिपर्फ इसलिए इस धरा को खत्म करने की बात नहीं करता क्योंकि हर पार्टी को डर है कि वैसा होते ही देश की तेरह पफीसदी मुस्लिम आबादी उस पार्टी के खिलापफ हो जाएगी और उसे मुस्लिम वोट बैंक से हाथ धेना पड़ेगा। हम पिफर से चाहते हैं कि हमारा यह कारण-परिणाम-विवेचन गलत साबित हो जाए, लेकिन हमें धरा 370 के लगातार चलते रहने का और कोई कारण भी समझ नहीं आ रहा और हम वास्तव में जानना चाहेंगे कि इसके अलावा और क्या कारण इस धरा के चलते रहने का हो सकता है। हम अपने बताए इस कारण को सिरे से नकारने की हालत में आ जाते अगर कश्मीर को एक मुस्लिम प्रश्न बनने की हद तक विकराल न बना दिया गया होता। भारत का मुस्लिम नेतृत्व अक्सर शिकायत करता है कि मुसलमानों से ही इस बात की अपेक्षा हमेशा क्यों की जाती है कि वे देशभक्ति का प्रमाण प्रस्तुत करें? क्यों आतंकवाद के मामले में मुस्लिम आबादी को ही हमेशा शक के घेरे में रखा जाता है? हम भारत के मुस्लिम नेतृत्व की इस शिकायत से सौ पफीसदी सहमत हैं। लेकिन उसी मुस्लिम नेतृत्व से हमारे दो प्रश्न मौजूदा हालात को लेकर भी हैं। जितने भी आतंकवादी संगठन, पिफर चाहे वे भारत के हों या पिफर भारत से बाहर के, भारत पर आतंकवादी हमले करते रहते हैं और उन हमलों की जिम्मेवारी भी गर्वपूर्वक लेते रहते हैं, वे सभी मुस्लिम संगठन हैं और अब तो उनमें से कुछ संगठन भारत में निजामे-मुस्तपफा लाने के इरादों की घोषणाओं के साथ आतंकवादी हमले कर रहे हैं। पर भारत के मुस्लिम नेतृत्व द्वारा इन आतंकवादी संगठनों के खुलेआम विरोध् का अभी भी हमको इंतजार है। निस्संदेह धर्मिक स्तर पर कुछ पफतवे आतंकवाद के खिलापफ जारी हुए हैं। लेकिन मुस्लिम नेतृत्व से इससे आगे बढ़कर कुछ ठोस राजनीतिक कदम उठाने का इंतजार देश को बना हुआ है। हमारा दूसरा सवाल कश्मीर के संदर्भ में है। कश्मीर के तमाम अलगाववादी नेता इस्लाम की दुहाई देकर भारत से अलग होने और पाकिस्तान में मिलने की घोषणाएं खुलेआम कर रहे हैं, किन्तु देश के मुस्लिम नेतृत्व ने ऐसी किसी घोषणा के खिलापफ कोई ठोस राजनीतिक कदम अभी तक नहीं उठाया। जाहिर है कि निहित स्वार्थों द्वारा आतंकवाद और कश्मीरी अलगाववाद हर हिसाब से मुस्लिम प्रश्न बना दिए गए हैं और हर मुस्लिम प्रश्न पर बढ़-चढ़कर बोलने वाले भारतीय मुस्लिम नेतृत्व की इन दोनों मसलों पर राजनीतिक चुप्पी और निष्क्रियता किसी भी हिसाब से तर्कपूर्ण नहीं मानी जा सकती। ऐसे में अगर कोई भी राजनीतिक पार्टी या केंद्र सरकार धरा 370 खत्म करने की दिशा में कोई भी कदम उठाने की हिम्मत नहीं कर पा रही तो जाहिर है कि उनकी इस राजनीति को मुस्लिम नेतृत्व की तर्कहीन चुप्पी के संदर्भ में ही पढ़ा जाना चाहिए। हमें पूरा विश्वास है कि जैसे ही भारत का मुस्लिम नेतृत्व इन दोनों मसलों पर ठोस राजनीतिक पहल करेगा, देश के राजनीतिक सोच की पिफ”ााँ ही बदल जाएगी। मुस्लिम नेतृत्व की बात अगर एक ओर रख दी जाए, तो आज संपूर्ण देश का मानस ऐसा बन चुका है कि वह एक क्षण के लिए भी धरा 370 को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। इसलिए अगर कांग्रेस या भाजपा या कोई भी राजनीतिक दल अगले चुनाव में देश की जनता को यह विश्वास दिलाने में सपफल हो गया कि आप हमें तीन चैथाई या दो तिहाई बहुमत दीजिए, और हम आपको भरोसा दिलाते हैं कि सत्ता में आते ही पहला काम यह किया जाएगा कि इस धरा को संविधान से निकाल बाहर कर दिया जाएगा, उस पार्टी को यकीनन इतना बहुमत आसानी से मिल जाने वाला है। देश वाकई अब धरा 370 से आजिज आ चुका है।

गुरुवार, 21 अगस्त 2008

बनिहाल टनल के उस पार है इंडिया


बनिहाल टनल के उस पार है इंडिया

बिशन कुमार

नगर की अलस्सुबह। दिन की गहमा-गहमी अभी शुरू नहीं हुई है। लाल चैक में टाटा सूमो पर जम्मू जाने वाली सवारियां चढ़ रही हैं। एक लड़का ते”ा आवा”ा लगा रहा है - जम्मू, जम्मू। अब्दुल वाहिद अटैची लेकर दौड़ता है और सूमो की अगली सीट पर जम जाता है। एक दोस्त उसे देख दुआ सलाम कर पूछता है, कहां जा रहे हो। वाहिद अपनी ”ाुबान कश्मीरी में जवाब देता है - इंडिया। यह किसी पिफल्म की अति नाटकीय स्क्रिप्ट नहीं है। यह एक ऐसा सच है जो लाल चैक से लेकर बटमालू बस अड्डे तक रो”ा घटता है। आम कश्मीरी के ‘देश’ की सरहद बनिहाल टनल के इस तरपफ खत्म हो जाती है और टनल के उस तरपफ है इंडिया। यह पफासला भौगोलिक नहीं बल्कि मानसिक है। इंडिया और कश्मीर के बीच का प़फासला आ”ाादी के 61 वर्षों बाद भी कम नहीं हुआ - बल्कि और गहरा हुआ है। कश्मीरियों के लिए आज भी ‘इंडिया’ एक ऐसी शय है जिसके साथ रहना उनकी मजबूरी है। इस मजबूरी का खूब प़फायदा उठाया पाकिस्तान ने और दिल्ली में बैठे हुक्मरानों और कश्मीर में थोपी गई पिट्ठू सरकारों ने दिशाहीन नीतियों के चलते कश्मीर और इंडिया के बीच न तो ”ामीनी दूरी कम करने की कोई सार्थक पहल की और न ही जेहानी। हालात इतने बदतर होते गए कि जो भी इंडिया के करीब दिखा, वह कश्मीरियों का दुश्मन बन गया - चाहे वह टनल के उस पार रहने वाले हिंदू हों या लद्दाखी बौ(। जम्मू और लद्दाख के बाशिंदे तो अपने लिए कश्मीर से अलग क्षेत्राीय स्वायत्तता की मांग करते आ रहे हैं। उन्हें कतई विश्वास नहीं कश्मीरी नेताओं पर। वे मानते हैं कि घाटी में बसे कश्मीरी मुस्लिम कभी भी उनके हित की बात नहीं सोच सकते। लगभग डेढ़ दशक पहले कश्मीरियों और बौ(ों के बीच टकराव इस कदर बढ़ गया था कि दोनों ने एक दूसरे का सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार कर दिया था - न तो बौ( कश्मीरियों की टैक्सी में बैठते थे और न ही कश्मीरी बौ(ों की दुकानों से सामान खरीदते। खूनी टकराव तक हुए। यह प़फासला अभी तक बरकरार है, हालांकि अब बहिष्कार की नौबत नहीं है। लगभग यही हाल कश्मीरियों और कारगिलियों के बीच है। कारगिल में लगभग सभी शिया मुसलमान हैं, जबकि कश्मीर में सुन्नी। दोनों के आपसी रिश्ते कभी सहज नहीं रहे। दोनों ही एक-दूसरे के बारे में अच्छी राय नहीं रखते। कारगिली शिया मौका मिलते ही कश्मीरियों की बुराई करने लगेगा, वहीं कश्मीरी मुसलमान कारगिली शियाओं के बारे में अनाप-शनाप बोलने लगेगा। शायद यही कारण है कि 1990 से कश्मीर से शुरू हुए तथाकथित ‘”ोहाद’ में कारगिलियों ने कोई हिस्सा नहीं लिया। शायद ही ऐसा मामला सामने आया हो कि जब कोई कारगिली शिया सरहद पार जाकर आतंकवाद का प्रशिक्षण लेने गया हो। ऊंची पहाड़ियों पर बैठे पाकिस्तानी सैनिक भी कुछ बरस पहले तक कारगिल शहर पर लगातार बम गिराते रहते थे। कश्मीर की आ”ाादी की लड़ाई में शामिल न होने की स”ाा मिलती थी शिया मुसलमानों को। जम्मू-कश्मीर के सक्रिय आतंकवादी संगठन भी कश्मीर में बनिहाल टनल के इस पार और उस पार रहने वाले मुसलमानों के बीच प़फर्क करते हैं। कश्मीर में बम पफटने और गोलीबारी की घटनाओं में निर्दोष कश्मीरी भी मारे जाते हैं पर उनका निशाना भारतीय सेना ही होती है। बनिहाल टनल के उस पार पड़ने वाले गांवों-कस्बों में आतंकवादी घटनाओं में जो लोग मरते हैं वे कश्मीरी ”ाुबान नहीं बोलते -चाहे हिंदू हों या मुसलमान। आतंकवादियों की किसी भी तं”ाीम ने हिंदी बोलने वाले मुसलमानों के मरने पर कभी अप़फसोस नहीं जताया। आखिर आम कश्मीरी अपने आपको हिंदुस्तान या भारत का हिस्सा क्यों नहीं मानता? श्रीनगर में इंडियन एक्सपे्रस के ब्यूरो प्रमुख मुजम्मिल जलील का मानना है कि इस मानसिकता को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। इस मानसिकता का बीज 1990 में नहीं पड़ा था, बल्कि सैंकड़ों वर्षों से कश्मीर विदेशी लोगों के आक्रमण और ”यादतियों का शिकार होता रहा। कश्मीरियों से हमेशा दोयम दर्जे के काम कराए जाते थे और प्रशासन के ऊंचे पदों पर उनका कोई हाथ नहीं रहा था। 1947 के बाद भी कश्मीर में कश्मीरी मुसलमानों को कश्मीरी पंडितों की सरमायेदारी में रहना पड़ा। कारण यह है कि मुसलमान मुख्यतः अशिक्षित थे और कश्मीरी पंडित पढ़े-लिखे होने के कारण स्कूल में शिक्षक के पद से लेकर सचिवालय में बाबू से साहब के पदों पर बैठे थे। अपनी ही ”ामीन पर दोयम दर्जे के नागरिक के तौर पर रहने का दुख उन्हें सदियों से सालता रहा था, जिसका विस्पफोट 1989-90 में आतंकवाद के रूप में हुआ। उनका गुस्सा उस दौरान लगाए जाने वाले नारों से सापफ समझ में आता है। ‘कश्मीर में रहना है तो अल्ला हो अकबर कहना होगा’ से लेकर ‘अशि गछि पाकिस्तान, बटो बगर बटनेऊ सान’ ;हमें चाहिए पाकिस्तान, कश्मीरी पंडितों के बगैर, कश्मीरी औरतों के साथद्ध, तक के सप़फर ने बेहद जहरीला वातावरण बना दिया था। कश्मीर मामलों के जानकार मानते हैं कि 1951 से लेकर 1998 तक कश्मीर में हर विधनसभा चुनावों में खुलकर धंध्ली हुई और दिल्ली की पिट्ठू सरकारें गद्दी पर बिठाई गईं। केवल 1977 के चुनाव को लोग कुछ हद तक सापफ-सुथरा मानते हैं। अलगाववादी नेता अब्दुल गनी लोन का कहना था कि कश्मीर की कहानी, वायदा खिलापफी की कहानी है। 1987 में एक ऐसा मौका भारत सरकार के सामने आया था जब कश्मीर की आ”ाादी मांगने वाले नेता मुस्लिम यूनाईटेड Úंट बनाकर चुनाव मैदान में उतरे थे। यानी सैÕयद सलाहुद्दीन, हिजबुल मुजाहिद्दीन का सुप्रीम कंमाडर पीर मोहम्मद युसुपफ शाह भी अमरा कदल क्षेत्रा से चुनाव मैदान में थे और बाकी उम्मीदवार भी उसके साथी थे। मतदान से पहले ही Úंट के सभी उम्मीदवारों और समर्थकों को जेल में ठूंस दिया गया। ”ााहिर है, दिल्ली नहीं चाहती थी कि ये नेता जीतें और सत्ता में भागीदारी करें। ये सभी नेता हार गए। इसी जेल में ही योजना बनी और पांच लोग जेल से छूटने के बाद सीध्े पाकिस्तान गए और हथियार और आ”ाादी का नारा लेकर लौटे। आज खुपिफया एजेंसियों और सेना की ‘वांटेड’ की सूची में जिन लोगों के नाम हैं उनमें से ”यादातर इस चुनाव में मतगणना केंद्रों पर Úंट के उम्मीदवारों के प्रतिनिध्यिों के तौर पर तैनात थे। जेकेएलएपफ के मुखिया यासीन मलिक भी उस चुनाव में सैÕयद सलाहुद्दीन के इलेक्शन एजेंट थे। हाल ही में सैÕयद सलाहुद्दीन ने ‘ग्रेटर कश्मीर’ को दिए इंटरव्यू में कहा है कि 1987 के चुनाव में Úंट अगर जीत जाता तो एसेम्बली में कश्मीर का भविष्य तय करने का अध्किार पाने के लिए एक प्रस्ताव लाया जाता। इसे भारत सरकार बर्दाश्त नहीं करती और एसेंबली भंग कर दी जाती। यहीं से शुरू होती कश्मीर की आ”ाादी की असली लड़ाई। सलाहुद्दीन और उसके साथियों का उद्देश्य उस वक्त तो पूरा नहीं हुआ। बैलेट छोड़कर बुलेट थामने के पीछे मुख्य तौर पर 1987 के चुनाव में Úंट को साजिशन हराना महत्वपूर्ण कारण माना जाता है। कश्मीरी भारत से अपना जुड़ाव महसूस नहीं करता, इसका महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि किसी भी सरकार ने कश्मीरियों के भले का ख्याल नहीं रखा और कश्मीरी को हमेशा शक की न”ार से देखा। अब हालात बदल रहे हैं और आज का युवा कश्मीरी ”ोहादी नारों से बहकता नहीं, बल्कि अपना भविष्य ख़ुद तय करने का अध्किार चाहता है। वह यह तय करने का हक चाहता है कि उसे हिंदुस्तान के साथ रहना है या आजाद होना है। एक साप़फ बदलाव यह भी है कि अध्सिंख्य कश्मीरी पाकिस्तान के साथ नहीं रहना चाहते। महनूर से लेकर आगा शाहिद अली की ग़”ालों में भी वतन के लिए जो तड़प है वह कोई पाकिस्तान की गोद में बैठने के लिए नहीं है, बल्कि सम्मान के साथ जीने के लिए है। इसका हक कश्मीरी चाहते हैं और वह मिलना भी चाहिए। उसका तरीका क्या हो, यह कश्मीरियों के साथ बैठकर तय करना होगा। जब तक यह नहीं होता, हिंदुस्तान बनिहाल टनल के इस पार ही रहेगा।

कश्मीर में कहीं ‘भारत’ दिखाई नही देता

कश्मीर में कहीं ‘भारत’ दिखाई नही देता
नरेन्द्र सहगल
भारत की सरकार, राजनीतिक नेता, धर्मिक/सामाजिक रहनुमा और भारत के लोग भले ही कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग कहते न थकते हों, परंतु जमीनी सच्चाई यह है कि आज का कश्मीर, कश्मीरी और कश्मीरियत भारत, भारतीयों और भारत राष्ट्र से कोसों दूर जा चुके हैं। पांच हजार वर्ष पुरानी कश्मीरियत पर मात्रा पांच सौ वर्ष पुरानी तहजीब हावी हो गई है। कश्मीर की ध्रती पर उपजे और देश भर में पफैले नागपूजा मत, शैवदर्शन, शेष भारत से कश्मीर आए बौ( मत और वैष्णव मत इत्यादि का नामोनिशान तक मिट चुका है। इनके खंडहर जरूर कहीं-कहीं दिखाई दे जाते हैं। सम्राट ललितादित्य, अवन्ति वर्मन, मेघवाहन, चंद्रापीड, हर्ष आदि का इतिहास तक समाप्त करने के षड्यंत्रा बाकायदा बु(िजीवी स्तर पर किया जा रहा है। आयुर्वेद, गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, ज्योतिष और सांख्य जैसे विश्व प्रसि( दर्शन कश्मीर की ध्रती पर पफले-पफूले हुए। आज ये तमाम दर्शन और विज्ञान भी नई कथित कश्मीरियत का शिकार हो चुके हैं। दुःख की बात तो यह है कि कश्मीर की इस विरासत को अपने बलिदान देकर संभाल कर रखने वाले कश्मीरी पंडित आज कश्मीर से विस्थापित होकर अपने ही भारत देश के कोने-कोने में बेसहारा जिंदगी जीने को मजबूर हैं। भारत से खुद को अलग मानने वाले आज कश्मीर के मालिक बने कह रहे हैं कि उन्हें आजादी चाहिए। इसी उद्देश्य के लिए पाकिस्तान तथा अन्य मुस्लिम देशों से हथियार, पैसा और मुजाहिद्दीन की मदद ली जा रही है। 1947 में हुए भारत विभाजन के समय जम्मू-कश्मीर का भारत में हुआ विधिवत विजय, 1956 में जम्मू-कश्मीर विधनसभा द्वारा इस विलय की पुष्टि, 1992 में भारतीय संसद द्वारा पारित प्रस्ताव ‘पाक अध्किृत कश्मीर समेत सारा जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग’, 1972 में हुआ शिमला-समझौता और कश्मीर में भारत द्वारा खर्च किया जा रहा अरबों का ध्न भी कश्मीर के लोगों को भारत का देशभक्त नागरिक नहीं बनाया जा सका। अलबत्ता भारत की पफौज भी वहां नाकाम साबित हो रही है। वास्तव में कश्मीर में भारत के नाम पर सिपर्फ भारत की पफौज ही है। बाकी सब कुछ वहां की ध्रती पर अगंड़ाई ले चुकी भारत विरोध्ी राजनीति की भेंट चढ़ चुका है। कश्मीर की ध्रती से भारत को लुप्त कर देने वाले पिछले छह सौ वर्षों के इतिहास में जाना इस लेख में संभव नहीं। बस इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि इस कालखंड में चली ध्र्मान्तरण की चक्की ने कश्मीर की भारतीय सूरत को बदलकर रख दिया। वर्तमान कश्मीर में भारत विरोध् का जहर मिला हुआ है और इस भारत विहीन कश्मीर के वर्तमान चेहरे को समझने के लिए 1947 और बाद के कुछ वर्षों के राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर डालना जरूरी है। पाकिस्तान द्वारा कश्मीर को हड़पने के लिए थोपे गए यु( के तुरंत बाद जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को भारत के प्रधनमंत्राी पंडित जवाहर लाल नेहरू के पास पत्रा भेज कर सम्पूर्ण जम्मू-कश्मीर का विलय भारत में कर दिया। इस क्षेत्रा में पाक अध्किृत कश्मीर भी शामिल था। पिफर भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड माउंट बेटन ने इस प्रस्ताव को मंजूरी देकर 27 अक्टूबर 1947 को पूरे जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय अध्किृत कर दिया। पिफर जम्मू-कश्मीर की जनता द्वारा चुनी गई संविधन सभा ने 1954 में प्रदेश के भारत में विलय को मानते हुए अपना एक अलग संविधन बनाया। 17 नवंबर 1956 को प्रदेश की विधनसभा में जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय की पुष्टि कर दी गई। उल्लेखनीय है कि प्रदेश की विधनसभा द्वारा स्वीकृत प्रदेश के संविधन की धरा तीन में स्पष्ट लिखा हुआ है कि - ‘जम्मू-कश्मीर प्रदेश भारत संघ का अभिन्न हिस्सा है और रहेगा।’ इसी संविधन की धरा चार इस प्रकार है - ‘इस प्रदेश की सीमाओं में वह सारा क्षेत्रा रहेगा जो 15 अगस्त 1947 को इस प्रदेश के महाराज के अध्पित्य में था’। स्पष्ट है कि पाक अध्किृत कश्मीर समेत सारा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न संवैधनिक अंग है। जम्मू-कश्मीर के संविधन में इस प्रदेश के भारत में विलय को मान्यता देने वाली धरा चार को भी इसी संविधन की धरा 146 ने सुरक्षात्मक कवच पहना दिया है। इस धरा के अनुसार जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय को निरस्त नहीं किया जा सकता। इस विलय के बाद भारत की सेना कश्मीर पहुंची। भारत के सैनिकों ने पाकिस्तान की कबाइली पफौज को परास्त करना शुरू कर दिया। पाकिस्तान द्वारा जबरदस्ती हड़पा गया कश्मीर का भाग मुक्त होने में थोड़ा ही समय बाकी था कि भारत के तत्कालीन प्रधनमंत्राी पंडित जवाहरलाल नेहरू इस मसले को संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में ले गए। विजयी सैनिकों के पांव में सुरक्षा परिषद के आदेशों की बेड़ियां डाल दी गईं। यु( विराम हो गया। पाकिस्तान के कब्जे वाली जमीन उसी के कब्जे में रह गई। यही आज ‘पाकिस्तान अध्किृत कश्मीर’ कहलाता है। इस कश्मीर को आज तक पाकिस्तान की असेंबली और वहां के सर्वोच्च न्यायालय ने पाकिस्तान का हिस्सा नहीं माना। जाहिर है कि अपने कब्जे वाले कश्मीर को अपना हिस्सा मानने पर भारतीय कश्मीर पर उसका दावा समाप्त हो जाता है। इसीलिए पाकिस्तान यु(विराम रेखा ;अब नियंत्राण रेखाद्ध जैसी किसी सीमा-रेखा को स्वीकार ही नहीं करता। यह एक अलग विषय है कि पाकिस्तान अपने कब्जे वाले कश्मीर में आतंकवादियों के लिए प्रशिक्षण शिविर चला रहा है। यहीं से कश्मीरी आतंकवादी भारतीय कश्मीर में घुसते हैं। पाकिस्तान इन्हीं घुसपैठियों की हर प्रकार से मदद करता है और वर्तमान कश्मीरी अलगाववादी नेताओं के साथ मिलकर प्रायः सभी कट्टरपंथी राजनीतिक दल कश्मीर को भारत से अलग स्वतंत्रा राष्ट्र बनाने के प्रयासों में जुटे हैं। इस तरह से कश्मीर में से भारत को गायब करने के षड्यंत्रा रचे जा रहे हैं। दुर्भाग्य और आश्चर्य की बात यह है कि कश्मीर में पनप चुके इस भारत-विरोध्ी जनून को भारत के ही संविधन में जोड़े गए अनुच्छेद 370 ने न केवल आश्रय ही दिया है अपितु उसे सुरक्षित, धरदार और स्थाई भी बनाया है। इसी अनुच्छेद ने भारतीयों को कश्मीर में विदेशी जैसा करार दिया है। जम्मू-कश्मीर को विशेष और भिन्न पंक्ति में खड़ा करने वाला भारतीय संविधन का यह अनुच्छेद ही वास्तव में हमारी इस घोषणा का मजाक उड़ाता है कि ‘कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है।’ यह ‘भिन्नता’ और ‘विशेषता’ ही इस प्रदेश को शेष देश से अलग कर देती है। इस अनुच्छेद 370 को संविधन द्वारा मान्यता प्राप्त अलगाववाद कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसी अनुच्छेद के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर का अपना अलग से संविधन है। भारत का संविधान, संसद, सर्वोच्च न्यायालय, चुनाव आयोग और वित्तीय आयोग प्रदेश के संविधन के आगे बौने साबित होते हैं। भारत के किसी भी कानून को लागू करने के लिए प्रदेश की विधानसभा की इजाजत लेनी पड़ती है। भारत के राष्ट्रपति भी जम्मू-कश्मीर संविधान के समक्ष हाथ खड़े कर देते हैं। जम्मू-कश्मीर का अपना एक अलग ध्वज, हल वाला लाल झंडा, है। यहां के सचिवालय, सरकारी भवनों, मंत्रियों के दफ्रतरों, घरों और गाड़ियों पर दो झंडे लाल झंडा और तिरंगा झंडा होते हैं। भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को प्रदेश के हल वाले लाल झंडे से एक-दो पफुट नीचे रहना पड़ता है। यहां की विधानसभा का कार्यकाल छह वर्ष का होता है। भारतीय संविधन की समवर्ती और संघीय सूची के सभी विषयों पर कानूनों की निर्माण-प्रक्रिया में प्रदेश की सरकार को अड़ंगा डालने और मनमानी करने का संवैधनिक अध्किार प्राप्त है। भारत के राष्ट्रपति भारतीय संविधन के अनुच्छेद 356 के तहत जम्मू-कश्मीर में कुछ नहीं कर सकते। राष्ट्रीय आपात स्थिति घोषित करने वाला अनुच्छेद 352 भी जम्मू-कश्मीर में नाकाम साबित हो चुका है। इसी प्रकार वित्तीय आपात स्थिति लागू करने वाला अनुच्छेद 360 तो यहां लागू ही नहीं हो सकता। भारतीय संविधन में समस्त देशवासियों के लिए एक ही नागरिकता की व्यवस्था है। परन्तु जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को प्रदेश की ;स्टेट सब्जैक्टद्ध और भारत की, इस तरह दोहरी नागरिकता प्राप्त है। जम्मू-कश्मीर का नागरिक भारत का नागरिक हो सकता है। परंतु कोई भी भारतीय जम्मू-कश्मीर का नागरिक नहीं हो सकता। भारत के नागरिक को जम्मू-कश्मीर में सम्पत्ति खरीदने, वोट देने और सरकारी नौकरी करने का हक प्राप्त नहीं है। अनुच्छेद 370 भी आड़ लेकर कश्मीर घाटी के कट्टरपंथी मुस्लिम नेता सदैव ही भारतीय सरकार द्वारा संचालित राष्ट्रीय महत्व के प्रकल्पों और कार्यक्रमों का मजहबी आधर पर विरोध् करते रहते हैं। वर्तमान में अमरनाथ-यात्रा पर उठा बवाल भी इसी कट्टरपंथी भारत विरोध्ी जनून का हिस्सा है। इसी अनुच्छेद से संरक्षण और संवैधनिक मान्यता प्राप्त कर कश्मीर की ध्रती पर अराष्ट्रीय तत्व सिर उठाकर खड़े हो गए हैं। कश्मीर के लोगों को राष्ट्रीय धरा में शामिल होने की प्रेरणा देने के बजाए भारत की सरकार ने अन्य प्रदेशांे की तुलना में उन्हें अत्यध्कि और असीमित अध्किार देकर सिर पर चढ़ा लिया है। इसी अनुच्छेद की वजह से कश्मीरी जनता के जेहन में भारत में विलय को लेकर शंका पैदा हुई और चार लाख कश्मीरी पंडितों को अपने घर, सम्पत्ति, बाग-बगीचे, देव-देवालय छोड़कर भागना पड़ा। भारतीय संविधन के निर्माता डाॅ. भीमराव आंबेडकर ने तत्कालीन प्रधनमंत्राी पं. जवाहरलाल को चेतावनी देेते हुए कहा था कि ‘इस अनुच्छेद 370 से जम्मू-कश्मीर राज्य को भारत के साथ समरस करने में दिक्कतें खड़ी होंगी। यह अनुच्छेद 370 कश्मीर घाटी के लोगों में अलगाववाद के बीज बोएगा। परंतु किसी अजीब और अपरिपक्व राजनीतिक मानसिकता ने सभी के दिमागों पर मानो कब्जा जमा लिया और अनुच्छेद 370 आज तक बरकरार है। परिणाम सबके सामने है। आज कश्मीर में हिसंक अलगाववाद अपनी चरम सीमा पर है। केवल पाकिस्तानपरस्त हुर्रियत कान्Úेंस ही नहीं, बल्कि नेशनल कांÚेंस, पीडीपी और ज्यादातर कांग्रेसी नेताओं ने भी कश्मीरी राष्ट्रवाद का नारा बुलंद कर रखा है। ये नेता कश्मीर में शेष भारत के सौ करोड़ नागरिकों को एक-दो एकड़ जमीन भी देने को तैयार नहीं हैं, पिफर अमरनाथ श्राइन बोर्ड को सौ एकड़ जमीन कहां से मिल पाती? केंद्र और प्रदेश की सरकारों को भी इन अलगाववादी तत्वों के आगे घुटने टेकने पड़ गए। यहीं यह शंका होती है कि क्या कश्मीर भारत का हिस्सा है? आज कश्मीर में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लग रहे हैं। वहां पाकिस्तान के झंडे पफहराते हैं। भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे जलाए जाते हैं। ‘भारतीय कुत्तों ;सैनिकोंद्ध वापस जाओ’ के नारे भी लगते हैं। भारत के लोग वहां सुरक्षित नहीं हैं। श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड की जमीन सरकार द्वारा वापस लिए जाने पर विजय दिवस मनाए जाता हैं। यह विजय दिवस किसकी विजय है? आज कश्मीर के प्रायः सभी राजनीतिक दल व पाकपरस्त संस्थाएं एक मंच पर आ गए हैं। भारत-विरोध् का यह बवंडर बड़े ही योजनाब( ढंग से खड़ा किया जा रहा है। जाहिर है कि कश्मीर का भारत में विलय और कश्मीर भारत का अविभाज्य भाग जैसी घोषणाएं केवल कागजी घोड़े हैं। भविष्य के इतिहासकार को कश्मीर में भारत को कहीं गहरे जाकर खोजना पड़ेगा।

शुक्रवार, 8 अगस्त 2008

तीसरा मोर्चा : भ्रान्ति की पठकथा

विश्वास मत के दौरान कांग्रेस सरकार बचाने में लगी थी और विपक्षी दल भाजपा और वाममोर्चा मिलकर सरकार गिराने पर आमादा थे। अपने-अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए इन दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों ने संसद की और अपनी गरिमा के साथ जो खिलवाड़ किया वह सबके सामने आ ही चुका है और चर्चा का विषय भी बना हुआ है। जब राष्ट्रीय पार्टियों की दुर्गति का आलम यह हो तो पिफर ‘भानमती का कुनबा’ या ‘चूं-चूं का मुरब्बा’ कहे जाने वाले तीसरे मोर्चे की बिसात ही क्या है? तीसरे मोर्चे के इतिहास को देखते हुए उससे यह उम्मीद वैसे भी नहीं लगाई जानी चाहिए कि वह संसद को कोई सार्थक दिशा दे पाएगा। क्यों? इसलिए कि तीसरे मोर्चा जब खुद की ही दिशा आज तक तय नहीं कर पाया तो संसद को दिशा देने का प्रश्न ही नहीं उठता। बार-बार बनकर बिखर जाने वाले इस से मोर्चे से कोई उम्मीद भला कैसे लगाई जा सकती है। तीसरे मोर्चे ने पहली बार नेशनल Úंट ;1989-1991द्ध के रूप में भारतीय राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई पर यह गठजोड़ ज्यादा दिन स्थायी नहीं रह पाया और बिखर गया। 1996 के आम चुनावांे मे जनता ने किसी पार्टी को बहुमत नहीं दिया, भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप मे उभरी, लेकिन भाजपा की सरकार महज दो हफ्रतों में गिर गई। कांग्रेस जो उस समय दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी, उसने सरकार बनाने की बजाए किसी और पार्टी को समर्थन देना उचित समझा। इसी से ‘यूनाइटेड Úंट’ ;1996-1998द्ध का उदय हुआ, जो तीसरे मोर्चे का दूसरा प्रयोग था। कांग्रेस और वाम मोर्चे के समर्थन से ‘यूनाइटेड Úंट’ की सरकार बनी। जुगाड़ की दम पर बने तीसरे मोर्चे का यह प्रयोग भी ज्यादा दिन नहीं चला। प्रधनमंत्राी एचडी देवगौड़ा को पद छोड़ना पड़ा। इस तरह देखा जाए तो जुगाड़ की दम पर बनने वाला तीसरा मोर्चा देश को चार प्रधनमंत्राी दे चुका है पर कोई भी प्रधनमंत्राी ज्यादा दिनांे तक टिक नहीं पाया। केंद्रीय सत्ता में आने के बावजूद तीसरा मोर्चा अपनी कोई अहमियत भारतीय राजनीति में दर्ज नहीं करा पाया है। इनका पूरा कार्यकाल सहयोगी दलांे को सहेजने और उनकी मांगों को पूरा करने में ही लगा रहा। राजनेताओं की मानें तो तीसरे मोर्चे का मुख्य उद्देश्य कांग्रेस और भाजपा से समान दूरी बना कर अपने आप को मजबूत करने का था। पर यह उद्देश्य कभी पूरा नहीं हुआ। अब तक इस मोर्चे के लगभग सभी घटक दल केंद्र में किसी न किसी गठबंध्न के साथ सत्ता सुख भोग चुके हैं। विचारधरा और उद्देश्यों की समानता का नाम लेकर समर्थन करने वाले ये घटक कभी राजग के साथ खड़े हो जाते हैं तो कभी संप्रग के साथ। गठबंध्न की राजनीति में इन दलों की विचारधरा के साथ इतना घालमेल हो चुका है कि आज इन दलों के कार्यकर्ता अपने दल की मूल विचारधरा ही नहीं खोज पा रहे हैं। तीसरे मोर्चे के व्यवहार को देख कर लगता है कि किसी मौके के अभाव में तीसरा मोर्चा कुछ हद तक संगठित रहता है पर जैसे ही कोई मौका आता है, जब तीसरा मोर्चा अपनी तटस्थता दिखा सकता है, मोर्चे में शामिल होने वाले सभी दल अपनी-अपनी संख्या और हैसियत के हिसाब से मोलभाव शुरू कर देते हंै और तीसरा मोर्चा पिफर किसी गुमनाम से चैराहे पर अपने मुद्दों को भुलाकर भ्रमित स्थिति में खड़ा रह जाता है । यही कारण है कि भारतीय राजनीति के दो ध््रुव कांग्रेस और भाजपा से अलग कोई तीसरा सशक्त मोर्चा अब तक खड़ा नहीं हो पाया। मोर्चे में हालिया बिखराव मनमोहन सिंह सरकार के विश्वास मत के दौरान बखूबी देखने को मिला। समाजवादी पार्टी जो तीसरे मोर्चे की जबरदस्त पैरोकार रही है, और उसी की पहल पर ही यूएनपीए खड़ा हुआ, जिसमें वे सभी पाटियों शामिल हुईं हैं जो न तो राजग मंे थीं और न ही संप्रग में। इस मोर्चे का अगुवाकार रही समाजवादी पार्टी अपने ही खड़े किए हुए यूएनपीए को छोड़ कर अलग हो गई और विश्वासमत के समय संप्रग के पक्ष में वोट दिया। इसी तरह कई अन्य दल भी अंत तक सौदेबाजी में पफंसे रहे और जब सौदा नहीं पटा तब तीसरे मोर्चे के साथ खड़े हो गए। इस बार भी जुगाड़ ने मुख्य भूमिका निभाई। यह शायद जुगाड़ ही था जो वामदलों को सपा की बजाए बसपा के पास ले आया। तीसरे मोर्चे का वैचारिक पैरोकार रहा वामदल हमेशा से तीसरे मोर्चे को मजबूत करने की वकालत करता है, पर ऐसा कर नहीं पाता है। अब वाममोर्चा बसपा सुप्रीमो मायावती में संभावनाएं तलाश रहा है। उसने विश्वास मत की सौदेबाजी में मायावती को प्रधनमंत्राी पद का दावेदार तक बना दिया, और मायावती भी अपने चिर-परिचित अंदाज को बदल कर अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर अपने ज्ञान की झलक दिखाने में जुट गईं। परंतु सिपर्फ ईरान गैस पाइपलाइन का मसला उठा देने से या परमाणु करार को मुस्लिम विरोध्ी घोषित कर देने से मायावती अंतर्राष्ट्रीय मामलों की विशेषज्ञ नहीं मानी जा सकती। मायावती कभी तीसरे मोर्चे का हिस्सा नहीं रहीं, परंतु विश्वासमत के दौरान जब संसद और देश विश्वसनीयता के मानदंडों से जूझ रहे थे उस समय मायावती अचानक तीसरे मोर्चे में जा कूदीं और तीसरे मोर्चे ने भी उन्हें अचानक अपने नेता के रूप में लपक लिया। अपनी अविश्वसनीयता और हल्केपन को साबित करने के लिए इससे बड़ी कोई दूसरी कसौटी हो सकती है? संसद की गरिमा में संेध् लगाने का काम तीसरे मोर्चे के नेताओं ने इस विश्वास मत के दौरान इतनी आसानी से कर लिया, इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर दो नेता उभरे, वे हैं एचडी देवेगौड़ा और अजित सिंह। मायावती के व्यक्तित्व में भावी प्रधनमंत्राी के गुणों को बखानते हुए ये दोनों नेता अपने दल-बल के साथ जितनी तेजी से तीसरे मोर्चे का हिस्सा बनने को आतुर दिखे और सरकार के खिलापफ वोट देने जैसी घोषणा करने लगे, उसी तेजी के साथ वे ये कहते हुए वापस भी लौटते हुए नजर आए कि वोट के बारे में पफैसला वे मतदान से कुछ समय पूर्व ही ले पाएंगे। तीसरे मोर्चे की नीयती ही एक पार्किंग लाट बनना रह गया है जब किसी पार्टी को कहीं जगह नहीं मिलती है तो वह यहां पर अपनी गाड़ी खड़ी कर देता है और नई संभावना जब दिखाई देती है तब अपनी गाड़ी के साथ चलता बनता है। पार्किंग की जगह पर गाड़ियां आती हैं और चली जाती हैं। वहां समाज का प्रतिबिंब बन सकने वाली इमारतें खड़ी नहीं की जा सकतीं।